आर्द्रा नक्षत्र — Ārdrā
आर्द्रा सत्ताईस नक्षत्रों में 6वाँ है, निरयन राशिचक्र में 66°40′ से 80° तक का 13°20′ का खण्ड, मिथुन के भीतर। यहाँ जन्मा चन्द्र विंशोत्तरी चक्र राहु की दशा (18 वर्ष) से खोलता है, खण्ड का केवल शेष भाग बचा रहता है। कुंडली मिलान में इसका गण मनुष्य, योनि श्वान (कुत्ता), नाड़ी आदि है।
एक दृष्टि में
- क्रमांक
- 6 / 27गणित
- विस्तार
- 66°40′ – 80° (13°20′)गणित
- राशि
- मिथुनगणित
- चरण (नवांश राशि)
- 1: धनु · 2: मकर · 3: कुम्भ · 4: मीनBPHS shodashavarga.11
- स्वामी (विंशोत्तरी)
- राहुBPHS C29.80
- विंशोत्तरी वर्ष
- 18BPHS C29.80
- गण
- मनुष्यMILAN.GANA
- योनि
- श्वान (कुत्ता)MILAN.YONI
- नाड़ी
- आदिMILAN.NADI
ग्रंथों में इसका नाम
नीचे के श्लोक वे स्थान हैं जहाँ SIA का भण्डार इस नक्षत्र का नाम छापता है; ऊपर के दशा और मेलापक नियम वह सिद्धान्त हैं जिससे SIA गणना करता है।
घोरश्च राक्षसो देवः कुबेरो यक्षकिन्नरौ। भ्रष्टः कुलघ्नो गरलो वह्निर्माया पुरीषकः।।३१।। अपाम्पतिर्मरुत्वांश्च कालः सर्पामृतेन्दुकाः। मृदुः कोमलहेरम्बब्रह्मविष्णुमहेश्वराः।।३२।। देवार्द्रौ कलिनाशश्च क्षितीशकमलाकरौ। गुलिको मृत्युकालश्च दावाग्निर्घोरसंज्ञकः।।३३।। यमश्च कण्टकसुधाऽमृतौ पूर्णनिशाकरः। विषदग्धकुलान्तश्च मुख्यो वंशक्षयस्तथा।।३४।। उत्पातकालसौम्याख्याः कोमलः शीतलाभिधः। करालदंष्ट्रचन्द्रास्यौ प्रवीणः कालपावकः।।३५।। दण्डभृन्निर्मलः सौम्यः क्रूरोऽतिशीतलोऽमृतः। पयोधि भ्रमणाख्यौ च चन्द्ररेखात्वयुग्मपौ।।३६।। समे भे व्यत्ययाज्ज्ञेयाः षष्ठ्यंशाश्च प्रकीर्तिताः। षष्ठ्यंशस्वामिनस्त्वोजे तदीशाद् व्यत्ययतः समे।।३७।।
संस्करण की टीकाविषम राशि में १ घोर, २ राक्षस, ३ देव, ४ कुबेर, ५ यक्ष, ६ किन्नर, ७ भ्रष्ट, ८ कुलघ्न, ९ गरल, १० अग्नि, ११ माया, १२ यम(पुरीष)।।३१।। १३ वरुण, १४ इन्द्र, १५ काल, १६ सर्प, १७ अमृत, १८ चन्द्रमा, १९ मृदु, २० कोमल, २१ हेरम्ब, २२ ब्रह्मा, २३ विष्णु, २४ शिव।।३२।। २५ देव, २६ आर्द्र, २७ कलिनाश, २८ क्षितीश, २९ कमलाकर, ३० गुलिक, ३१ मृत्यु, ३२ काल, ३३ दावाग्नि, ३४ घोर।।३३।। ३५ यम, ३६ कंटक, ३७ सुधा, ३८ अमृत, ३९ पूर्णचन्द्र, ४० विषदग्ध, ४१ कुलनाश, ४२ मुख्य, ४३ वंशक्षय।।३४।। ४४ उत्पात, ४५ काल, ४६ सौम्य, ४७ कोमल, ४८ शीतल, ४९ करालदंष्ट्र, ५० इन्दुमुख, ५१ प्रवीण, ५२ कालाग्नि।।३५।। ५३ दंडभृत्, ५४ निर्मल, ५५ सौम्य, ५६ क्रूर, ५७ अतिशीतल, ५८ अमृत, ५९ भ्रमण और ६० इन्दुरेखा।।३६।। विषम राशि में घोर आदि और सम राशि में चन्द्ररेखा आदि क्रम से षष्ठ्यंश के अधिपति होते हैं।।३७।।
दस्रश्च मृगशीर्षश्च शर्वः पुष्यश्च सैंद्रभम् । उत्तराविश्वजिच्छ्रोणी चित्रा पुष्यश्च वायुभम् ।।७।। अभिजिद्वसुभं पौष्णं कृत्तिका च पुनर्वसुः । पूर्वोत्तरप्रोष्ठपदौ शततारा च विश्वभम् ।।८।।
संस्करण की टीकाअश्विनी, मृगशिरा, आर्द्रा, पुष्य, आर्द्रा, उत्तरा, पूर्वाषाढ़, श्रवण, चित्रा, पुष्य, स्वाती।।७।। अभिजित्, धनिष्ठा, रेवती, कृत्तिका, पुनर्वसु, पूर्वाभाद्रपद, उत्तरा भाद्रपद, शतभिष, उत्तराषाढ।।८।।
मेलापक सिद्धान्त
भावार्थगण (6 गुण) — हर नक्षत्र देव, मनुष्य या राक्षस गण (स्वभाव-वर्ग) का है। एक ही गण 6; देव–मनुष्य 5–6; देव–राक्षस 1; मनुष्य–राक्षस 0। यहाँ का बेमेल (गण दोष) मूल स्वभाव के टकराव का संकेत है, जो चन्द्र-राशि स्वामियों की मित्रता से कम होता है।
भावार्थयोनि (4 गुण) — हर नक्षत्र का एक पशु-स्वभाव है (अश्व, गज, मेष, सर्प, श्वान, मार्जार, मूषक, गो, महिष, व्याघ्र, मृग, वानर, नकुल, सिंह)। एक ही योनि 4; मित्र योनियाँ 3; सम 2; अमित्र 1; शत्रु-जोड़े (अश्व–महिष, गज–सिंह, मेष–वानर, सर्प–नकुल, श्वान–मृग, मार्जार–मूषक, गो–व्याघ्र) 0। यह सहज, शारीरिक अनुकूलता का माप है।
भावार्थनाड़ी (8 गुण) — सबसे भारी कूट। 27 नक्षत्र तीन नाड़ियों (आदि, मध्य, अन्त्य) में चक्र से बँटे हैं — शरीर-प्रकृति की धारा। भिन्न नाड़ी पूरे 8 देती है; एक ही नाड़ी 0 देती है और नाड़ी दोष है, मेलापक की सबसे गम्भीर आपत्ति (संतान और स्वास्थ्य से जोड़ी गई)। दोनों चन्द्र एक राशि में भिन्न नक्षत्रों में हों, या एक नक्षत्र में भिन्न चरणों में, तो दोष का शास्त्रीय परिहार है।
प्रश्न
आर्द्रा नक्षत्र का स्वामी कौन है?
विंशोत्तरी में राहु — आर्द्रा में चन्द्र होने पर पहली महादशा राहु की होती है, पूर्ण रूप में 18 वर्ष।
आर्द्रा के गण, योनि और नाड़ी क्या हैं?
गण मनुष्य, योनि श्वान (कुत्ता), नाड़ी आदि — कुंडली मिलान के तीन नक्षत्र-आधारित कूट, 6, 4 और 8 गुण के।
आर्द्रा किस राशि में है?
मिथुन — इसके चार चरण नवांश राशियों धनु, मकर, कुम्भ, मीन में पड़ते हैं।
ये श्लोक अपनी कुंडली पर लागू होते देखिए।
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