बारह भाव
लग्न से गिने बारह भाव वह ढाँचा हैं जिस पर हर व्याख्या टिकी है। फलदीपिका का प्रथम अध्याय उनकी शास्त्रीय संज्ञाएँ गिनाता है — भाव उसी से जाना जाता है जिस पर उसका अधिकार है — और पराशर का भावेशफल अध्याय स्वामी-दर-स्वामी, स्थान-दर-स्थान बताता है कि हर भाव का अधिपति कुंडली में कहीं से भी क्या करता है।
SIA किसी विषय को उसी क्रम में पढ़ता है जिसमें ग्रंथ पढ़ते हैं: पहले भावेश, फिर कारक, फिर स्थित और दृष्टि देने वाले ग्रह। नीचे के पृष्ठ हर भाव का पहला साक्षी छापते हैं — उसके स्वामी की सभी स्थितियों की पूरी तालिका, हर कोष्ठक में एक श्लोक।
बारह भाव
ग्रंथों में
लग्नं होरा कल्यदेहोदयाख्यं रूपं शीर्षं वर्तमानं च जन्म । वित्तं विद्या स्वान्नपानानि भुक्तिं दक्षाक्ष्यास्यं पत्रिका वाक्कुटुम्बम् ॥
संस्करण की टीकालग्न, होरा, कल्य, देह, उदय, रूप, शीर्ष, वर्तमान और जन्म--ये प्रथम भाव के पर्याय हैं। वित्त, विद्या, स्व, अन्नपान (सम्पदादि), भुक्ति, दक्षिण नेत्र, आस्य (मुखाकृति), पत्रिका (लेखन), वाक् (वाणी) और कुटुम्ब--ये द्वितीय भाव की संज्ञाएं हैं ॥१०॥
सूर्यो गुरुः कुजः सोमो गुरुर्भौमः सितः शनिः।।३७।। गुरुश्चन्द्रसुतो जीवो मन्दश्च भावकारकः।।३७।। पुनस्तन्वादयो भावाः स्थाप्यास्तेषां शुभाऽशुभम्। लाभं तृतीयं रन्ध्रं च शत्रुभावव्ययं तथा। एषां योगेन यो भावस्तन्नाशं प्राप्नुयाद्ध्रुवम्।।३८।।
संस्करण की टीकाक्रम से सूर्य, गुरु, भौम, बुध, गुरु, भौम, शुक्र, शनि, गुरु, बुध, गुरु और शनि ये लग्नादि भावों के कारक होते हैं।।३७।। फिर भी लाभ आदि भावों के शुभ-अशुभ को लिखकर उनके शुभाशुभ का निर्णय करना चाहिए। एकादश, तृतीय, आठवाँ, छठवाँ और बारहवाँ भाव— इनके साथ जिस भाव का सम्बन्ध होता है उस भाव के फल का नाश हो जाता है अर्थात् इन भावों के स्पष्ट दृश्यादि का योग करने से जो भाव बने वह नष्ट हो जाता है।।३८।।
ये श्लोक अपनी कुंडली पर लागू होते देखिए।
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