षष्ठ भाव — अरि
षष्ठ भाव अरि भाव है। फलदीपिका इसकी संज्ञाएँ गिनाती है, और भाव उसी से जाना जाता है जिस पर उसका अधिकार है। इसका नैसर्गिक कारक मंगल है। नीचे वह पहला साक्षी है जिसे SIA इस भाव के किसी भी विषय के लिए पढ़ता है: पराशर का कथन कि इसका स्वामी बारह स्थानों में से हर एक से क्या करता है — पूरी तालिका, हर कोष्ठक में एक श्लोक।
एक दृष्टि में
- क्रमांक
- 6 / 12गणित
- शास्त्रीय संज्ञा
- अरि भावPHAL C1.13
- कारक ग्रह
- मंगलBPHS C13.21
- मेष लग्न में यहाँ की राशि
- कन्यागणित
फलदीपिका — भाव की संज्ञाएँ
ऋणास्त्रचोरक्षतरोगशत्रून् ज्ञात्याजिदुष्कृत्यघभीत्यवज्ञाः । जामित्रचित्तोत्थमदास्तकामान् द्यूनाध्वलोकान् पतिमार्गभार्याः ॥
संस्करण की टीकाऋण, अस्त्र, चोर, क्षत (घाव, चोट), रोग, शत्रु, ज्ञाति (सगोत्रिय), अजि (युद्ध, विवाद, झगड़ा), दुष्कृति (दुष्कर्म), अघ (पापकर्म), भीति (भय) और अवज्ञा (मानहानि, अपमान)--ये छठे भाव के पर्याय हैं। जामित्र, चित्तोत्थ, मद (कामवासना), अस्त, काम, द्यून, अध्व (मार्ग), लोक, पति और भार्या (स्त्री)--ये सप्तम भाव के पर्याय हैं ॥१३॥
इस भाव का स्वामी बारह भावों में
पराशर का भावेशफल अध्याय बताता है कि किसी भाव का स्वामी हर स्थान से क्या करता है। इस भाव के स्वामी के लिए SIA यही पंक्तियाँ लागू करता है — हर कोष्ठक में एक श्लोक, जैसा छपा है।
षष्ठेशो सप्तमे लाभे लग्ने वा कीर्त्तिमान् भवेत्। धनवान् गुणवान् मानी साहसी पुत्रवर्जितः।।४३।।
षष्ठेश सातवें, ग्यारहवें या लग्न में हो तो जातक कीर्त्तिमान्, धनवान्, गुणी, मानी, साहसी और पुत्रहीन होता है।।४३।।
षष्ठेशे कर्मवित्तस्थे साहसी कुलविश्रुतः। परदेशे सुखी वक्ता स्वकर्मे चैकनिष्ठिकः।।४४।।
षष्ठेश दशम वा दूसरे भाव में हो तो जातक साहसी, कुल में विख्यात, परदेशी, वक्ता और अपने कर्म में निष्णात होता है।।४४।।
षष्ठेशे सहजे तुर्ये क्रोधेनारक्तलोचनः। मनस्वी पिशुनो द्वेषी चलचित्तोऽतिवित्तवान्।।४५।।
षष्ठेश तीसरे या चौथे भाव में हो जातक का नेत्र क्रोध से रक्तवर्ण का, मनस्वी, कृपण, द्वेष करने वाला, अस्थिरचित्त और अत्यंत धनी होता है।।४५।।
षष्ठेशे सहजे तुर्ये क्रोधेनारक्तलोचनः। मनस्वी पिशुनो द्वेषी चलचित्तोऽतिवित्तवान्।।४५।।
षष्ठेश तीसरे या चौथे भाव में हो जातक का नेत्र क्रोध से रक्तवर्ण का, मनस्वी, कृपण, द्वेष करने वाला, अस्थिरचित्त और अत्यंत धनी होता है।।४५।।
अध्याय में नहीं कहा गया — SIA पंक्ति बनाने के बदले इस कोष्ठक के लिए कुछ नहीं छापता।
अध्याय में नहीं कहा गया — SIA पंक्ति बनाने के बदले इस कोष्ठक के लिए कुछ नहीं छापता।
षष्ठेशो सप्तमे लाभे लग्ने वा कीर्त्तिमान् भवेत्। धनवान् गुणवान् मानी साहसी पुत्रवर्जितः।।४३।।
षष्ठेश सातवें, ग्यारहवें या लग्न में हो तो जातक कीर्त्तिमान्, धनवान्, गुणी, मानी, साहसी और पुत्रहीन होता है।।४३।।
अध्याय में नहीं कहा गया — SIA पंक्ति बनाने के बदले इस कोष्ठक के लिए कुछ नहीं छापता।
षष्ठेशो नवमे यस्य काष्ठपाषाणविक्रयी। व्यवहारे क्वचिद्धानिः क्वचिद्वृद्धिर्भवेत्किल।।४९।।
षष्ठेश नवंम स्थान में हो तो जातक लकड़ी, पत्थर आदि बेचने वाला, व्यापार में कभी हानि और कभी वृद्धिवाला होता है।।४९।।
षष्ठेशे कर्मवित्तस्थे साहसी कुलविश्रुतः। परदेशे सुखी वक्ता स्वकर्मे चैकनिष्ठिकः।।४४।।
षष्ठेश दशम वा दूसरे भाव में हो तो जातक साहसी, कुल में विख्यात, परदेशी, वक्ता और अपने कर्म में निष्णात होता है।।४४।।
षष्ठेशो सप्तमे लाभे लग्ने वा कीर्त्तिमान् भवेत्। धनवान् गुणवान् मानी साहसी पुत्रवर्जितः।।४३।।
षष्ठेश सातवें, ग्यारहवें या लग्न में हो तो जातक कीर्त्तिमान्, धनवान्, गुणी, मानी, साहसी और पुत्रहीन होता है।।४३।।
अध्याय में नहीं कहा गया — SIA पंक्ति बनाने के बदले इस कोष्ठक के लिए कुछ नहीं छापता।
कारक श्लोक
सूर्यो गुरुः कुजः सोमो गुरुर्भौमः सितः शनिः।।३७।। गुरुश्चन्द्रसुतो जीवो मन्दश्च भावकारकः।।३७।। पुनस्तन्वादयो भावाः स्थाप्यास्तेषां शुभाऽशुभम्। लाभं तृतीयं रन्ध्रं च शत्रुभावव्ययं तथा। एषां योगेन यो भावस्तन्नाशं प्राप्नुयाद्ध्रुवम्।।३८।।
संस्करण की टीकाक्रम से सूर्य, गुरु, भौम, बुध, गुरु, भौम, शुक्र, शनि, गुरु, बुध, गुरु और शनि ये लग्नादि भावों के कारक होते हैं।।३७।। फिर भी लाभ आदि भावों के शुभ-अशुभ को लिखकर उनके शुभाशुभ का निर्णय करना चाहिए। एकादश, तृतीय, आठवाँ, छठवाँ और बारहवाँ भाव— इनके साथ जिस भाव का सम्बन्ध होता है उस भाव के फल का नाश हो जाता है अर्थात् इन भावों के स्पष्ट दृश्यादि का योग करने से जो भाव बने वह नष्ट हो जाता है।।३८।।
प्रश्न
षष्ठ भाव किसका सूचक है?
षष्ठ भाव के लिए फलदीपिका की सूची ऊपर पूरी उद्धृत है; इसका कारक ग्रह मंगल है, और इससे सम्बन्धित किसी भी प्रश्न के लिए SIA पहले इसके स्वामी की स्थिति पढ़ता है।
षष्ठ भावेश कहाँ शुभ या अशुभ है?
पराशर बारह स्थितियों की श्रेणी नहीं बनाते; वे हर एक का फल कहते हैं, और अध्याय के अन्तिम श्लोक कहते हैं कि हर फल स्वामी के बल के अनुसार घटता-बढ़ता है। SIA निर्णय छापने से पहले स्थिति को स्वामी के षड्बल के साथ तौलता है।
ये श्लोक अपनी कुंडली पर लागू होते देखिए।
SIA में अपनी कुंडली बनाइए — व्याख्या की हर पंक्ति के साथ उसका श्लोक।
सम्बन्धित
हर चिह्न SIA के भण्डार का वास्तविक श्लोक-क्रमांक है — वही चिह्न जो ऐप अपनी व्याख्याओं के साथ छापता है। · अद्यतन
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