भाव 5/12 · putra

पञ्चम भाव — पुत्र

पञ्चम भाव पुत्र भाव है। फलदीपिका इसकी संज्ञाएँ गिनाती है, और भाव उसी से जाना जाता है जिस पर उसका अधिकार है। इसका नैसर्गिक कारक गुरु है। नीचे वह पहला साक्षी है जिसे SIA इस भाव के किसी भी विषय के लिए पढ़ता है: पराशर का कथन कि इसका स्वामी बारह स्थानों में से हर एक से क्या करता है — पूरी तालिका, हर कोष्ठक में एक श्लोक।

एक दृष्टि में

क्रमांक
5 / 12गणित
शास्त्रीय संज्ञा
पुत्र भावPHAL C1.12
कारक ग्रह
गुरुBPHS C13.21
मेष लग्न में यहाँ की राशि
सिंहगणित

फलदीपिका — भाव की संज्ञाएँ

PHAL C1.12फलदीपिका · Phaladīpikā 1.12

राज्यं गोमहिषसुगन्धवस्त्रभूषाः पातालं हिबुकसुखाम्बुसेतुनद्यः । राजाङ्कं सचिवकरात्मधीभविष्यज्ज्ञानाम्नः सुतजठरश्रुतिस्मृतीश्च ॥

संस्करण की टीकागृह, क्षेत्र, मातुल, भागिनेय, बन्धु, मित्र, वाहन, माता, राज्य, गोधन, बैल, भैंस, सुगन्ध, वस्त्र, आभूषण, पाताल, हिबुक, सुख, अम्बु, सेतु और नदी--ये चतुर्थ भाव के पर्याय हैं। राजांक, सचिव, कर (हाथ), आत्मा, बुद्धि, भविष्यज्ञान, असु (पुत्र), श्रुति और स्मृति--ये पंचम भाव की संज्ञाएं हैं ॥११-१२॥

इस भाव का स्वामी बारह भावों में

पराशर का भावेशफल अध्याय बताता है कि किसी भाव का स्वामी हर स्थान से क्या करता है। इस भाव के स्वामी के लिए SIA यही पंक्तियाँ लागू करता है — हर कोष्ठक में एक श्लोक, जैसा छपा है।

प्रथम भाव मेंBPHS C16.27

सुतेशे लग्नसहजे मायावी पिशुनो महान्। लोष्ठं दत्तवान्नैव काचिद्द्रव्यस्य का कथा।।३५।।

पंचमेश लग्न और तीसरे भाव में हो तो जातक मायावी और कृपण होता है।।३५।।

द्वितीय भाव मेंBPHS C16.28b

सुतेशो चायुधि धने बहुपुत्री न संशयः। कासश्वाससुखी न स्यात्क्रोधयुक्तो धनान्वितः।।३६।।

पंचमेश ८वें वा दूसरे भाव में हो तो जातक अनेक पुत्रों से युक्त, कास-श्वासरोगी, क्रोधी और धनी होता है।।३६।।

तृतीय भाव मेंBPHS C16.27

सुतेशे लग्नसहजे मायावी पिशुनो महान्। लोष्ठं दत्तवान्नैव काचिद्द्रव्यस्य का कथा।।३५।।

पंचमेश लग्न और तीसरे भाव में हो तो जातक मायावी और कृपण होता है।।३५।।

चतुर्थ भाव मेंBPHS C16.29

सुतेशो मातृभवने चिरं मातृसुखं भवेत्। लक्ष्मीयुक्तः सुबुद्धिश्च सचिवोऽप्यथवा गुरुः।।३७।।

सुतेश ४ भाव में हो तो जातक को माता का सुख अधिक, लक्ष्मीयुक्त, बुद्धिमान्, मंत्री वा गुरु होता है। मुहूर्त्त को जानने वाला, टेढ़ा बोलने वाला, धनी और बुद्धिमान् होता है।।३७।।

पञ्चम भाव मेंBPHS C16.30

सुतेशो पञ्चमे यस्य तस्य पुत्रो न जीवति। क्षणिकः क्रूरभाषी च धनिको मतिमान्भवेत्।।३८।।

सुतेश ५वें भाव में हो तो जातक का पुत्र नहीं जीता है।।३८।।

षष्ठ भाव मेंBPHS C16.30b

सुतेशो षष्ठरिःफस्थे पुत्रः शत्रुत्वमाप्नुयात्। मृतापत्यो दत्तपुत्रो धनपुत्रोऽथवा भवेत्।।३९।।

सुतेश छठे, बारहवें भाव में हो तो जातक को पुत्र से शत्रुता होती है और उसके पुत्र मर जाते हैं। उसे दत्तक पुत्र या क्रीत पुत्र होता है।।३९।।

सप्तम भाव मेंBPHS C16.31

सुतेशो कामगे मानी सर्वधर्मसमन्वितः। तुंगबष्टिस्तनुस्वामी भक्तियुक्तैकचेतसा।।४०।।

सुतेश ७वें भाव में हो तो जातक मानी, सभी धर्मों से युक्त, ऊँचे नाक वाला और भक्ति युक्त होता है।।४०।।

अष्टम भाव मेंBPHS C16.28b

सुतेशो चायुधि धने बहुपुत्री न संशयः। कासश्वाससुखी न स्यात्क्रोधयुक्तो धनान्वितः।।३६।।

पंचमेश ८वें वा दूसरे भाव में हो तो जातक अनेक पुत्रों से युक्त, कास-श्वासरोगी, क्रोधी और धनी होता है।।३६।।

नवम भाव मेंBPHS C16.32

सुतेशो नवमे कर्मे पुत्रो भूपसमो भवेत्। अथवा ग्रन्थकर्ता च विख्यातः कुलदीपकः।।४१।।

सुतेश ९वें या १०वें भाव में हो तो जातक का पुत्र राजा के समान होता है अथवा प्रसिद्ध ग्रंथकर्त्ता होता है।।४१।।

दशम भाव मेंBPHS C16.32

सुतेशो नवमे कर्मे पुत्रो भूपसमो भवेत्। अथवा ग्रन्थकर्ता च विख्यातः कुलदीपकः।।४१।।

सुतेश ९वें या १०वें भाव में हो तो जातक का पुत्र राजा के समान होता है अथवा प्रसिद्ध ग्रंथकर्त्ता होता है।।४१।।

एकादश भाव मेंBPHS C16.32b

सुतेशो लाभभवने पण्डितो जनवल्लभः। ग्रन्थकर्त्ता महादक्षो बहुपुत्रधनान्वितः।।४२।।

सुतेश लाभभाव में हो तो जातक पंडित, जनप्रिय, ग्रंथकर्त्ता, दक्ष, अनेक पुत्र और धन से युक्त होता है।।४२।।

द्वादश भाव मेंBPHS C16.30b

सुतेशो षष्ठरिःफस्थे पुत्रः शत्रुत्वमाप्नुयात्। मृतापत्यो दत्तपुत्रो धनपुत्रोऽथवा भवेत्।।३९।।

सुतेश छठे, बारहवें भाव में हो तो जातक को पुत्र से शत्रुता होती है और उसके पुत्र मर जाते हैं। उसे दत्तक पुत्र या क्रीत पुत्र होता है।।३९।।

कारक श्लोक

BPHS C13.21बृहत् पराशर होरा शास्त्र · अथ कारकाध्यायः v37, folio 110

सूर्यो गुरुः कुजः सोमो गुरुर्भौमः सितः शनिः।।३७।। गुरुश्चन्द्रसुतो जीवो मन्दश्च भावकारकः।।३७।। पुनस्तन्वादयो भावाः स्थाप्यास्तेषां शुभाऽशुभम्। लाभं तृतीयं रन्ध्रं च शत्रुभावव्ययं तथा। एषां योगेन यो भावस्तन्नाशं प्राप्नुयाद्ध्रुवम्।।३८।।

संस्करण की टीकाक्रम से सूर्य, गुरु, भौम, बुध, गुरु, भौम, शुक्र, शनि, गुरु, बुध, गुरु और शनि ये लग्नादि भावों के कारक होते हैं।।३७।। फिर भी लाभ आदि भावों के शुभ-अशुभ को लिखकर उनके शुभाशुभ का निर्णय करना चाहिए। एकादश, तृतीय, आठवाँ, छठवाँ और बारहवाँ भाव— इनके साथ जिस भाव का सम्बन्ध होता है उस भाव के फल का नाश हो जाता है अर्थात् इन भावों के स्पष्ट दृश्यादि का योग करने से जो भाव बने वह नष्ट हो जाता है।।३८।।

प्रश्न

पञ्चम भाव किसका सूचक है?

पञ्चम भाव के लिए फलदीपिका की सूची ऊपर पूरी उद्धृत है; इसका कारक ग्रह गुरु है, और इससे सम्बन्धित किसी भी प्रश्न के लिए SIA पहले इसके स्वामी की स्थिति पढ़ता है।

पञ्चम भावेश कहाँ शुभ या अशुभ है?

पराशर बारह स्थितियों की श्रेणी नहीं बनाते; वे हर एक का फल कहते हैं, और अध्याय के अन्तिम श्लोक कहते हैं कि हर फल स्वामी के बल के अनुसार घटता-बढ़ता है। SIA निर्णय छापने से पहले स्थिति को स्वामी के षड्बल के साथ तौलता है।

ये श्लोक अपनी कुंडली पर लागू होते देखिए।

SIA में अपनी कुंडली बनाइए — व्याख्या की हर पंक्ति के साथ उसका श्लोक।

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