चतुर्थ भाव — सुख
चतुर्थ भाव सुख भाव है। फलदीपिका इसकी संज्ञाएँ गिनाती है, और भाव उसी से जाना जाता है जिस पर उसका अधिकार है। इसका नैसर्गिक कारक चन्द्र है। नीचे वह पहला साक्षी है जिसे SIA इस भाव के किसी भी विषय के लिए पढ़ता है: पराशर का कथन कि इसका स्वामी बारह स्थानों में से हर एक से क्या करता है — पूरी तालिका, हर कोष्ठक में एक श्लोक।
एक दृष्टि में
- क्रमांक
- 4 / 12गणित
- शास्त्रीय संज्ञा
- सुख भावPHAL C1.12
- कारक ग्रह
- चन्द्रBPHS C13.21
- मेष लग्न में यहाँ की राशि
- कर्कगणित
फलदीपिका — भाव की संज्ञाएँ
राज्यं गोमहिषसुगन्धवस्त्रभूषाः पातालं हिबुकसुखाम्बुसेतुनद्यः । राजाङ्कं सचिवकरात्मधीभविष्यज्ज्ञानाम्नः सुतजठरश्रुतिस्मृतीश्च ॥
संस्करण की टीकागृह, क्षेत्र, मातुल, भागिनेय, बन्धु, मित्र, वाहन, माता, राज्य, गोधन, बैल, भैंस, सुगन्ध, वस्त्र, आभूषण, पाताल, हिबुक, सुख, अम्बु, सेतु और नदी--ये चतुर्थ भाव के पर्याय हैं। राजांक, सचिव, कर (हाथ), आत्मा, बुद्धि, भविष्यज्ञान, असु (पुत्र), श्रुति और स्मृति--ये पंचम भाव की संज्ञाएं हैं ॥११-१२॥
इस भाव का स्वामी बारह भावों में
पराशर का भावेशफल अध्याय बताता है कि किसी भाव का स्वामी हर स्थान से क्या करता है। इस भाव के स्वामी के लिए SIA यही पंक्तियाँ लागू करता है — हर कोष्ठक में एक श्लोक, जैसा छपा है।
सुखेशे लग्नगे वापि पितृपुत्रौ च स्नेहलौ । पितृपक्षवैरिकलितं पितृनाम्ना प्रसिद्धं च ।।२६।।
सुखेश लग्न में हो तो पिता-पुत्र में स्नेह होता है, चाचा आदि से वैरभाव और पिता के नाम से प्रसिद्धि होती है।।२६।।
सर्वसम्पद्युतो मानी साहसी कुहकान्वितः । कुटुम्बसंयुतो भोगी सुखेशे च धनस्थिते ।।२७।।
सुखेश धनभाव में हो तो जातक सभी सम्पत्तियों से युक्त, मानी, साहसी, इन्द्रजाल करने वाला, कुटुम्ब से युक्त और भोगी होता है।।२७।।
सुखेशे सहजे लाभे नित्यरोगी भवेन्नरः । उदारो गुणवान्दाता स्वभुजार्जितवित्तवान् ।।२८।।
सुखेश तीसरे या ग्यारहवें भाव में हो तो जातक नित्यरोगी, उदार, गुणी, दाता और अपने परिश्रम से द्रव्य पैदा करने वाला होता है।।२८।।
तुर्येशो तुर्यगे मन्त्री भवेत्सर्वधनाधिपः । चतुरः शीलवान् मानी धनाढ्यः स्त्रीप्रियः सुखी ।।२९।।
⟦continues on PDF 187 — NOT read by this pass⟧ सुखेश सुख भाव में हो तो मंत्री सभी प्रकार की संपत्ति से युक्त, चतुर, शीलवान्, मानी, धनी और स्त्रीप्रिय तथा सुखी होता है।।२९।।
तुर्येशे पञ्चमे भाग्ये सुखी सर्वजनप्रियः। विष्णुभक्तिरतो मानी स्वभुजार्जितवित्तवान्।।३०।।
सुखेश पाँचवें वा नवम भाव में हो तो जातक सुखी, सर्वजनप्रिय, विष्णुभक्त, मानी और अपने पराक्रम से द्रव्य पैदा करने वाला होता है।।३०।।
सुखेशो शत्रुगेहस्थे सदा स्याद्बहुयातृकः। क्रोधी चौरोऽभिचारी च दुष्टचित्तो मनस्व्यपि।।३१।।
सुखेश छठे भाव में हो तो जातक हर समय परदेश में रहनेवाला, क्रोधी, चोर, घात करने वाला, दुष्ट और मनस्वी होता है।।३१।।
सुखेशो सप्तमे लग्ने बहुविद्यासमन्वितः। पित्रार्जितधनत्यागी सभायां मूकवद्भवेत्।।३२।।
सुखेश सातवें भाव में हो तो जातक अनेक विद्याओं से युक्त, पिता के धन को त्यागने वाला, सभा में मूक होता है।।३२।।
सुखेशे व्ययरन्ध्रस्थे सुखहीनो भवेन्नरः। पितृसौख्यं भवेदल्पं क्लीबो वा जारजोऽपि वा।।३३।।
सुखेश बारहवें या ८वें स्थान में हो तो जातक सुखहीन होता है और उसे पिता का अल्पसुख नपुंसक अथवा जार से उत्पन्न हुआ होता है।।३३।।
तुर्येशे पञ्चमे भाग्ये सुखी सर्वजनप्रियः। विष्णुभक्तिरतो मानी स्वभुजार्जितवित्तवान्।।३०।।
सुखेश पाँचवें वा नवम भाव में हो तो जातक सुखी, सर्वजनप्रिय, विष्णुभक्त, मानी और अपने पराक्रम से द्रव्य पैदा करने वाला होता है।।३०।।
सुखेशो कर्मगेहस्थे राजमान्यो भवेन्नरः। रसायनी महाहृष्टो भुनक्ति सुखमद्भुतम्।।३४।।
सुखेश कर्मभाव में हो तो जातक राजमान्य, रसायन क्रिया को जानने वाला, प्रसन्न और सुख को भोगने वाला होता है।।३४।।
सुखेशे सहजे लाभे नित्यरोगी भवेन्नरः । उदारो गुणवान्दाता स्वभुजार्जितवित्तवान् ।।२८।।
सुखेश तीसरे या ग्यारहवें भाव में हो तो जातक नित्यरोगी, उदार, गुणी, दाता और अपने परिश्रम से द्रव्य पैदा करने वाला होता है।।२८।।
सुखेशे व्ययरन्ध्रस्थे सुखहीनो भवेन्नरः। पितृसौख्यं भवेदल्पं क्लीबो वा जारजोऽपि वा।।३३।।
सुखेश बारहवें या ८वें स्थान में हो तो जातक सुखहीन होता है और उसे पिता का अल्पसुख नपुंसक अथवा जार से उत्पन्न हुआ होता है।।३३।।
कारक श्लोक
सूर्यो गुरुः कुजः सोमो गुरुर्भौमः सितः शनिः।।३७।। गुरुश्चन्द्रसुतो जीवो मन्दश्च भावकारकः।।३७।। पुनस्तन्वादयो भावाः स्थाप्यास्तेषां शुभाऽशुभम्। लाभं तृतीयं रन्ध्रं च शत्रुभावव्ययं तथा। एषां योगेन यो भावस्तन्नाशं प्राप्नुयाद्ध्रुवम्।।३८।।
संस्करण की टीकाक्रम से सूर्य, गुरु, भौम, बुध, गुरु, भौम, शुक्र, शनि, गुरु, बुध, गुरु और शनि ये लग्नादि भावों के कारक होते हैं।।३७।। फिर भी लाभ आदि भावों के शुभ-अशुभ को लिखकर उनके शुभाशुभ का निर्णय करना चाहिए। एकादश, तृतीय, आठवाँ, छठवाँ और बारहवाँ भाव— इनके साथ जिस भाव का सम्बन्ध होता है उस भाव के फल का नाश हो जाता है अर्थात् इन भावों के स्पष्ट दृश्यादि का योग करने से जो भाव बने वह नष्ट हो जाता है।।३८।।
प्रश्न
चतुर्थ भाव किसका सूचक है?
चतुर्थ भाव के लिए फलदीपिका की सूची ऊपर पूरी उद्धृत है; इसका कारक ग्रह चन्द्र है, और इससे सम्बन्धित किसी भी प्रश्न के लिए SIA पहले इसके स्वामी की स्थिति पढ़ता है।
चतुर्थ भावेश कहाँ शुभ या अशुभ है?
पराशर बारह स्थितियों की श्रेणी नहीं बनाते; वे हर एक का फल कहते हैं, और अध्याय के अन्तिम श्लोक कहते हैं कि हर फल स्वामी के बल के अनुसार घटता-बढ़ता है। SIA निर्णय छापने से पहले स्थिति को स्वामी के षड्बल के साथ तौलता है।
ये श्लोक अपनी कुंडली पर लागू होते देखिए।
SIA में अपनी कुंडली बनाइए — व्याख्या की हर पंक्ति के साथ उसका श्लोक।
सम्बन्धित
हर चिह्न SIA के भण्डार का वास्तविक श्लोक-क्रमांक है — वही चिह्न जो ऐप अपनी व्याख्याओं के साथ छापता है। · अद्यतन
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