तृतीय भाव — सहज
तृतीय भाव सहज भाव है। फलदीपिका इसकी संज्ञाएँ गिनाती है, और भाव उसी से जाना जाता है जिस पर उसका अधिकार है। इसका नैसर्गिक कारक मंगल है। नीचे वह पहला साक्षी है जिसे SIA इस भाव के किसी भी विषय के लिए पढ़ता है: पराशर का कथन कि इसका स्वामी बारह स्थानों में से हर एक से क्या करता है — पूरी तालिका, हर कोष्ठक में एक श्लोक।
एक दृष्टि में
- क्रमांक
- 3 / 12गणित
- शास्त्रीय संज्ञा
- सहज भावPHAL C1.11
- कारक ग्रह
- मंगलBPHS C13.21
- मेष लग्न में यहाँ की राशि
- मिथुनगणित
फलदीपिका — भाव की संज्ञाएँ
दुश्चिक्योरो दक्षकर्णं च सेनां धैर्यं शौर्यं विक्रमं भ्रातरं च । गेहं क्षेत्रं मातुलं भागिनेयं बन्धुं मित्रं वाहनं मातरं च ॥११॥
संस्करण की टीकादुश्चिक्य, उर (वक्षःस्थल), दक्षकर्ण, सेना, धैर्य, शौर्य, विक्रम (पराक्रम) और भ्राता--ये तृतीय भाव की संज्ञाएं हैं। गृह, क्षेत्र (भूमि, कृषिगत भूमि), मातुल (मामा), भागिनेय (भांजा), बन्धु, मित्र, वाहन, माता... [चतुर्थ भाव के पर्याय आगे भी चलते हैं] ॥११-१२॥
इस भाव का स्वामी बारह भावों में
पराशर का भावेशफल अध्याय बताता है कि किसी भाव का स्वामी हर स्थान से क्या करता है। इस भाव के स्वामी के लिए SIA यही पंक्तियाँ लागू करता है — हर कोष्ठक में एक श्लोक, जैसा छपा है।
तृतीयेशो तनौ लाभे स्वभुजार्जितवित्तवान् । मूर्खः कृशो महारोगी साहसी परसेवकः ।।१९।।
तृतीयेश लगन या लाभ भाव में हो तो जातक अपनी कमाई से धनी, मूर्ख, कृश, महारोगी अपितु साहसी, दूसरे का सेवक होता है।।१९।।
गुदाभञ्जनिकः स्थूलः परभार्याधने रुचिः । स्वल्पारम्भी सुखी न स्यात्तृतीयेशे धनं गते ।।२०।।
तृतीयेश दूसरे भाव में हो तो जातक स्त्री के स्वभाव का, स्थूल, परस्त्री के धन से कार्य आरम्भ करने वाला और सुखी नहीं होता है।।२०।।
तृतीयेशो तृतीयस्थे विक्रमी सुतसंयुतः । धनयुक्तो महाहृष्टो भुनक्ति सुखमद्भुतम् ।।२१।।
तृतीयेश तीसरे भाव में हो तो जातक पराक्रमी, पुत्रवान्, धनी, प्रसन्न और अद्भुत् सुख को भोगने वाला होता है।।२१।।
तृतीयेशो सुखे कर्मे पञ्चमे वा सुखी सदा । अतिक्रूरा भवेद्भार्या धनाढ्यो मतिमान् भवेत् ।।२२।।
तृतीयेश चौथे, दसवें और पाँचवें भाव में हो तो जातक सदा सुखी, अतिक्रूर स्त्री से युक्त, धनी और बुद्धिमान् होता है।।२२।।
तृतीयेशो सुखे कर्मे पञ्चमे वा सुखी सदा । अतिक्रूरा भवेद्भार्या धनाढ्यो मतिमान् भवेत् ।।२२।।
तृतीयेश चौथे, दसवें और पाँचवें भाव में हो तो जातक सदा सुखी, अतिक्रूर स्त्री से युक्त, धनी और बुद्धिमान् होता है।।२२।।
तृतीयेशो रिपौ यस्य भ्राता शत्रुर्महाधनी । मातुलानां सुखं न स्यान्मातुल्या भोगमिच्छति ।।२३।।
तृतीयेश छठे भाव में हो तो जातक का भाई शत्रु होता है। जातक स्वयं महाधनी, मामा के सुख से हीन और मामी से संभोग की इच्छावाला होता है।।२३।।
तृतीयेशोऽष्टमे द्यूने राजद्वारे मृतिर्भवेत् । चोरो वा परगामी वा बाल्ये कष्टं दिने दिने ।।२४।।
तृतीयेश आठवें या सातवें भाव में हो तो जातक की मृत्यु राजद्वार में होती है, चोर, परस्त्रीगामी और बाल्य समय में कष्ट भोगने वाला होता है।।२४।।
तृतीयेशोऽष्टमे द्यूने राजद्वारे मृतिर्भवेत् । चोरो वा परगामी वा बाल्ये कष्टं दिने दिने ।।२४।।
तृतीयेश आठवें या सातवें भाव में हो तो जातक की मृत्यु राजद्वार में होती है, चोर, परस्त्रीगामी और बाल्य समय में कष्ट भोगने वाला होता है।।२४।।
तृतीयेशो व्यये भाग्ये स्त्रीभिर्भाग्योदयो भवेत् । पिता तस्य महाचोरः सुखेऽपि दुःखदर्शकः ।।२५।।
तृतीयेश बारहवें या भाग्यभाव में हो तो जातक का भाग्योदय स्त्री के द्वारा होता है और उसका पिता बड़ा चोर होता है।।२५।।
तृतीयेशो सुखे कर्मे पञ्चमे वा सुखी सदा । अतिक्रूरा भवेद्भार्या धनाढ्यो मतिमान् भवेत् ।।२२।।
तृतीयेश चौथे, दसवें और पाँचवें भाव में हो तो जातक सदा सुखी, अतिक्रूर स्त्री से युक्त, धनी और बुद्धिमान् होता है।।२२।।
तृतीयेशो तनौ लाभे स्वभुजार्जितवित्तवान् । मूर्खः कृशो महारोगी साहसी परसेवकः ।।१९।।
तृतीयेश लगन या लाभ भाव में हो तो जातक अपनी कमाई से धनी, मूर्ख, कृश, महारोगी अपितु साहसी, दूसरे का सेवक होता है।।१९।।
तृतीयेशो व्यये भाग्ये स्त्रीभिर्भाग्योदयो भवेत् । पिता तस्य महाचोरः सुखेऽपि दुःखदर्शकः ।।२५।।
तृतीयेश बारहवें या भाग्यभाव में हो तो जातक का भाग्योदय स्त्री के द्वारा होता है और उसका पिता बड़ा चोर होता है।।२५।।
कारक श्लोक
सूर्यो गुरुः कुजः सोमो गुरुर्भौमः सितः शनिः।।३७।। गुरुश्चन्द्रसुतो जीवो मन्दश्च भावकारकः।।३७।। पुनस्तन्वादयो भावाः स्थाप्यास्तेषां शुभाऽशुभम्। लाभं तृतीयं रन्ध्रं च शत्रुभावव्ययं तथा। एषां योगेन यो भावस्तन्नाशं प्राप्नुयाद्ध्रुवम्।।३८।।
संस्करण की टीकाक्रम से सूर्य, गुरु, भौम, बुध, गुरु, भौम, शुक्र, शनि, गुरु, बुध, गुरु और शनि ये लग्नादि भावों के कारक होते हैं।।३७।। फिर भी लाभ आदि भावों के शुभ-अशुभ को लिखकर उनके शुभाशुभ का निर्णय करना चाहिए। एकादश, तृतीय, आठवाँ, छठवाँ और बारहवाँ भाव— इनके साथ जिस भाव का सम्बन्ध होता है उस भाव के फल का नाश हो जाता है अर्थात् इन भावों के स्पष्ट दृश्यादि का योग करने से जो भाव बने वह नष्ट हो जाता है।।३८।।
प्रश्न
तृतीय भाव किसका सूचक है?
तृतीय भाव के लिए फलदीपिका की सूची ऊपर पूरी उद्धृत है; इसका कारक ग्रह मंगल है, और इससे सम्बन्धित किसी भी प्रश्न के लिए SIA पहले इसके स्वामी की स्थिति पढ़ता है।
तृतीय भावेश कहाँ शुभ या अशुभ है?
पराशर बारह स्थितियों की श्रेणी नहीं बनाते; वे हर एक का फल कहते हैं, और अध्याय के अन्तिम श्लोक कहते हैं कि हर फल स्वामी के बल के अनुसार घटता-बढ़ता है। SIA निर्णय छापने से पहले स्थिति को स्वामी के षड्बल के साथ तौलता है।
ये श्लोक अपनी कुंडली पर लागू होते देखिए।
SIA में अपनी कुंडली बनाइए — व्याख्या की हर पंक्ति के साथ उसका श्लोक।
सम्बन्धित
हर चिह्न SIA के भण्डार का वास्तविक श्लोक-क्रमांक है — वही चिह्न जो ऐप अपनी व्याख्याओं के साथ छापता है। · अद्यतन
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