भाव 2/12 · dhana

द्वितीय भाव — धन

द्वितीय भाव धन भाव है। फलदीपिका इसकी संज्ञाएँ गिनाती है, और भाव उसी से जाना जाता है जिस पर उसका अधिकार है। इसका नैसर्गिक कारक गुरु है। नीचे वह पहला साक्षी है जिसे SIA इस भाव के किसी भी विषय के लिए पढ़ता है: पराशर का कथन कि इसका स्वामी बारह स्थानों में से हर एक से क्या करता है — पूरी तालिका, हर कोष्ठक में एक श्लोक।

एक दृष्टि में

क्रमांक
2 / 12गणित
शास्त्रीय संज्ञा
धन भावPHAL C1.10
कारक ग्रह
गुरुBPHS C13.21
मेष लग्न में यहाँ की राशि
वृषभगणित

फलदीपिका — भाव की संज्ञाएँ

PHAL C1.10फलदीपिका · Phaladīpikā 1.10

लग्नं होरा कल्यदेहोदयाख्यं रूपं शीर्षं वर्तमानं च जन्म । वित्तं विद्या स्वान्नपानानि भुक्तिं दक्षाक्ष्यास्यं पत्रिका वाक्कुटुम्बम् ॥

संस्करण की टीकालग्न, होरा, कल्य, देह, उदय, रूप, शीर्ष, वर्तमान और जन्म--ये प्रथम भाव के पर्याय हैं। वित्त, विद्या, स्व, अन्नपान (सम्पदादि), भुक्ति, दक्षिण नेत्र, आस्य (मुखाकृति), पत्रिका (लेखन), वाक् (वाणी) और कुटुम्ब--ये द्वितीय भाव की संज्ञाएं हैं ॥१०॥

इस भाव का स्वामी बारह भावों में

पराशर का भावेशफल अध्याय बताता है कि किसी भाव का स्वामी हर स्थान से क्या करता है। इस भाव के स्वामी के लिए SIA यही पंक्तियाँ लागू करता है — हर कोष्ठक में एक श्लोक, जैसा छपा है।

प्रथम भाव मेंBPHS C16.6

धनेशो च तनौ पुत्री स्वकुटुम्बस्य कण्टकः । धनवान्निष्ठुरः कामी परकार्येषु तत्परः ।।९।।

⟦continues on PDF 184⟧ धनेश लग्न में हो तो जातक पुत्रवान्, अपने कुटुम्ब का कंटक, धनी, निष्ठुर, कामी और दूसरे के कार्य में तत्पर होता है।।९।।

द्वितीय भाव में

अध्याय में नहीं कहा गया — SIA पंक्ति बनाने के बदले इस कोष्ठक के लिए कुछ नहीं छापता।

तृतीय भाव मेंBPHS C16.8

धनेशो सहजे तुर्ये विक्रमी मतिमान् गुणी । परदाराभिमानी च लोभी वा देवनिन्दकः ।।११।।

धनेश तीसरे या चौथे भाव में हो तो जातक पराक्रमी, बुद्धिमान्, गुणी, परायी स्त्री का अभिमान करने वाला, लोभी या देवनिंदक होता है।।११।।

चतुर्थ भाव मेंBPHS C16.8

धनेशो सहजे तुर्ये विक्रमी मतिमान् गुणी । परदाराभिमानी च लोभी वा देवनिन्दकः ।।११।।

धनेश तीसरे या चौथे भाव में हो तो जातक पराक्रमी, बुद्धिमान्, गुणी, परायी स्त्री का अभिमान करने वाला, लोभी या देवनिंदक होता है।।११।।

पञ्चम भाव मेंBPHS C16.9b

धनेशे सुतभावस्थे पुत्रतो धनवान् भवेत् । कृपणो दुःखभाग्जातो यशस्वी पुत्रवान् भवेत् ।।१२।।

धनेश पाँचवें भाव में हो तो पुत्र से धनी, कृपण, दुःख भोगने वाला, यशस्वी और पुत्रवान् होता है।।१२।।

षष्ठ भाव मेंBPHS C16.10

धनेशो शत्रुगे शत्रोर्धनं प्राप्नोति निश्चितम् । शत्रुतो वित्तनाशः स्याज्जंघोर्वोर्भवेच्च रुक् ।।१३।।

धनेश छठे भाव में हो तो शत्रु से धन प्राप्त करने वाला, पुत्र द्वारा धन नाश वाला और जंघा तथा उरु प्रदेश में रोग युक्त होता है।।११।।

सप्तम भाव मेंBPHS C16.11

धनेशो सप्तमे वैद्यः परजायाभिगामिनः । जाया तस्य भवेद्वेश्या माता च व्यभिचारिणी ।।१४।।

धनेश सातवें भाव में हो तो जातक वैद्य होता है, परस्त्रीगामी होता है। उसकी स्त्री वेश्या और माता व्यभिचारिणी होती है।।१४।।

अष्टम भाव मेंBPHS C16.12b

धनेशो मृत्युगेहस्थे भूमिद्रव्यं लभेद् ध्रुवम् । जायासौख्यं भवेत्स्वल्पं ज्येष्ठभ्रातृसुखं न हि ।।१५।।

धनेश आठवें भाव में हो तो जातक को भूमिगत द्रव्य का लाभ, स्त्री का सुख अल्प और ज्येष्ठ भाई का सुख नहीं होता है।।१५।।

नवम भाव मेंBPHS C16.13

धनेशो नवमे लाभे धनवानुद्यमी पटुः । बाल्ये रोगी सुखी पश्चाद्याववदायुः समाप्यते ।।१६।।

⟦continues on PDF 185⟧ धनेश नवम भाव वा लाभभाव में हो तो जातक धनी, उद्यमी, विद्वान् होता है। बाल्य अवस्था में रोगी और पीछे आयु पर्यंत सुखी होता है।।१६।।

दशम भाव मेंBPHS C16.13b

धनेशो दशमे यस्य कामी मानी च पण्डितः । बहुदारधनैर्युक्तः सुतहीनो प्रजायते ।।१७।।

धनेश दशम भाव में हो तो जातक कामी, मानी, पंडित, अनेक स्त्री तथा धन से युक्त और पुत्रहीन होता है।।१७।।

एकादश भाव मेंBPHS C16.13

धनेशो नवमे लाभे धनवानुद्यमी पटुः । बाल्ये रोगी सुखी पश्चाद्याववदायुः समाप्यते ।।१६।।

⟦continues on PDF 185⟧ धनेश नवम भाव वा लाभभाव में हो तो जातक धनी, उद्यमी, विद्वान् होता है। बाल्य अवस्था में रोगी और पीछे आयु पर्यंत सुखी होता है।।१६।।

द्वादश भाव मेंBPHS C16.14

धनेशो व्ययगे ज्ञानी साहसी धनवर्जितः । जीविका नृपगेहाच्च ज्येष्ठपुत्रसुखं न हि ।।१८।।

धनेश बारहवें भाव में हो तो जातक ज्ञानी, साहसी, धनहीन, राजगृह से जीविकावाला और ज्येष्ठ पुत्र के सुख से हीन होता है।।१८।।

कारक श्लोक

BPHS C13.21बृहत् पराशर होरा शास्त्र · अथ कारकाध्यायः v37, folio 110

सूर्यो गुरुः कुजः सोमो गुरुर्भौमः सितः शनिः।।३७।। गुरुश्चन्द्रसुतो जीवो मन्दश्च भावकारकः।।३७।। पुनस्तन्वादयो भावाः स्थाप्यास्तेषां शुभाऽशुभम्। लाभं तृतीयं रन्ध्रं च शत्रुभावव्ययं तथा। एषां योगेन यो भावस्तन्नाशं प्राप्नुयाद्ध्रुवम्।।३८।।

संस्करण की टीकाक्रम से सूर्य, गुरु, भौम, बुध, गुरु, भौम, शुक्र, शनि, गुरु, बुध, गुरु और शनि ये लग्नादि भावों के कारक होते हैं।।३७।। फिर भी लाभ आदि भावों के शुभ-अशुभ को लिखकर उनके शुभाशुभ का निर्णय करना चाहिए। एकादश, तृतीय, आठवाँ, छठवाँ और बारहवाँ भाव— इनके साथ जिस भाव का सम्बन्ध होता है उस भाव के फल का नाश हो जाता है अर्थात् इन भावों के स्पष्ट दृश्यादि का योग करने से जो भाव बने वह नष्ट हो जाता है।।३८।।

प्रश्न

द्वितीय भाव किसका सूचक है?

द्वितीय भाव के लिए फलदीपिका की सूची ऊपर पूरी उद्धृत है; इसका कारक ग्रह गुरु है, और इससे सम्बन्धित किसी भी प्रश्न के लिए SIA पहले इसके स्वामी की स्थिति पढ़ता है।

द्वितीय भावेश कहाँ शुभ या अशुभ है?

पराशर बारह स्थितियों की श्रेणी नहीं बनाते; वे हर एक का फल कहते हैं, और अध्याय के अन्तिम श्लोक कहते हैं कि हर फल स्वामी के बल के अनुसार घटता-बढ़ता है। SIA निर्णय छापने से पहले स्थिति को स्वामी के षड्बल के साथ तौलता है।

ये श्लोक अपनी कुंडली पर लागू होते देखिए।

SIA में अपनी कुंडली बनाइए — व्याख्या की हर पंक्ति के साथ उसका श्लोक।

सम्बन्धित

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