प्रथम भाव — तनु
प्रथम भाव तनु भाव है। फलदीपिका इसकी संज्ञाएँ गिनाती है, और भाव उसी से जाना जाता है जिस पर उसका अधिकार है। इसका नैसर्गिक कारक सूर्य है। नीचे वह पहला साक्षी है जिसे SIA इस भाव के किसी भी विषय के लिए पढ़ता है: पराशर का कथन कि इसका स्वामी बारह स्थानों में से हर एक से क्या करता है — पूरी तालिका, हर कोष्ठक में एक श्लोक।
एक दृष्टि में
- क्रमांक
- 1 / 12गणित
- शास्त्रीय संज्ञा
- तनु भावPHAL C1.10
- कारक ग्रह
- सूर्यBPHS C13.21
- मेष लग्न में यहाँ की राशि
- मेषगणित
फलदीपिका — भाव की संज्ञाएँ
लग्नं होरा कल्यदेहोदयाख्यं रूपं शीर्षं वर्तमानं च जन्म । वित्तं विद्या स्वान्नपानानि भुक्तिं दक्षाक्ष्यास्यं पत्रिका वाक्कुटुम्बम् ॥
संस्करण की टीकालग्न, होरा, कल्य, देह, उदय, रूप, शीर्ष, वर्तमान और जन्म--ये प्रथम भाव के पर्याय हैं। वित्त, विद्या, स्व, अन्नपान (सम्पदादि), भुक्ति, दक्षिण नेत्र, आस्य (मुखाकृति), पत्रिका (लेखन), वाक् (वाणी) और कुटुम्ब--ये द्वितीय भाव की संज्ञाएं हैं ॥१०॥
इस भाव का स्वामी बारह भावों में
पराशर का भावेशफल अध्याय बताता है कि किसी भाव का स्वामी हर स्थान से क्या करता है। इस भाव के स्वामी के लिए SIA यही पंक्तियाँ लागू करता है — हर कोष्ठक में एक श्लोक, जैसा छपा है।
लग्नेशो लग्नगे पुंसः सुखी भुजपराक्रमी । मनस्वी चातिचाञ्चल्यो द्विभार्यः परगोऽपि वा ।।१।।
लग्नेश लग्न में हो तो जातक सुखी, पराक्रमी, मनस्वी, अत्यंत चंचल, दो स्त्रियों वाला और परस्त्रीगामी भी होता है।।१।।
लग्नेशो धनगे लाभे सलाभः पण्डितो नरः । सुशीलो धर्मविन्मानी बहुदारगुणैर्युतः ।।२।।
⟦continues on PDF 183⟧ लग्नेश धनस्थान में या लाभस्थान में हो तो जातक लाभ से युक्त पंडित, सुशील, धर्मात्मा, ज्ञानी और अनेक स्त्रियों से युक्त होता है।।२।।
लग्नेशो सहजे षष्ठे सिंहतुल्यपराक्रमी । सर्वसम्पद्युतो मानी द्विभार्यो मतिमान्सुखी ।।३।।
लग्नेश तीसरे या छठे भाव में हो तो जातक सिंह के समान पराक्रमी, सभी सम्पत्ति से युक्त, मानी, दो स्त्रियों वाला और बुद्धिमान् एवं सुखी होता है।।३।।
लग्नेशो दशमे तुर्ये पितृमातृसुखान्वितः । बहुभ्रातृयुतः कामी गुणसौन्दर्यसंयुतः ।।४।।
लग्नेश दशम या चतुर्थ भाव में हो तो पिता-माता के सुख से युक्त, अनेक भाइयों वाला, कामी, गुण-सौंदर्य से युक्त होता है।।४।।
लग्नेशो पञ्चमे दानी सुतसौख्यं च मध्यमम् । प्रथमापत्यनाशः स्यात्क्रोधी लोभी नृपप्रियः ।।५।।
लग्नेश पाँचवें भाव में हो तो जातक दानी, मध्यम संतान सुखवाला, प्रथम संतान से हीन, क्रोधी, लोभी और राजप्रिय होता है।।५।।
लग्नेशो सहजे षष्ठे सिंहतुल्यपराक्रमी । सर्वसम्पद्युतो मानी द्विभार्यो मतिमान्सुखी ।।३।।
लग्नेश तीसरे या छठे भाव में हो तो जातक सिंह के समान पराक्रमी, सभी सम्पत्ति से युक्त, मानी, दो स्त्रियों वाला और बुद्धिमान् एवं सुखी होता है।।३।।
लग्नेशो सप्तमे यस्य भार्या तस्य न जीवति । विरक्तो वा प्रवासी वा दरिद्रो वा नृपोऽपि वा ।।६।।
लग्नेश सातवें भाव में हो तो स्त्री का विनाश होता है। वह व्यक्ति विरक्त हो या परदेशी हो, वा दरिद्र हो या राजा होता है।।६।।
लग्नेशो व्ययगेऽष्टस्थे सिद्धविद्याविशारदः । द्यूती चौरो महाक्रोधी परनार्यतिभोगकृत् ।।७।।
लग्नेश १२वें या ८वें भाव में हो तो जातक जूआ खेलने वाला, चोर, क्रोधी और परस्त्रीगामी होता है।।८।।
लग्नेशो नवमे पुंसो भाग्यवान् जनवल्लभः । विष्णुभक्तः पटुर्वाग्मी पुत्रदारधनैर्युतः ।।८।।
लग्नेश नवम भाव में हो तो पुरुष भाग्यवान्, जनप्रिय, विष्णुभक्त, पंडित, वक्ता और पुत्र-स्त्री से युक्त होता है।।८।।
लग्नेशो दशमे तुर्ये पितृमातृसुखान्वितः । बहुभ्रातृयुतः कामी गुणसौन्दर्यसंयुतः ।।४।।
लग्नेश दशम या चतुर्थ भाव में हो तो पिता-माता के सुख से युक्त, अनेक भाइयों वाला, कामी, गुण-सौंदर्य से युक्त होता है।।४।।
लग्नेशो धनगे लाभे सलाभः पण्डितो नरः । सुशीलो धर्मविन्मानी बहुदारगुणैर्युतः ।।२।।
⟦continues on PDF 183⟧ लग्नेश धनस्थान में या लाभस्थान में हो तो जातक लाभ से युक्त पंडित, सुशील, धर्मात्मा, ज्ञानी और अनेक स्त्रियों से युक्त होता है।।२।।
लग्नेशो व्ययगेऽष्टस्थे सिद्धविद्याविशारदः । द्यूती चौरो महाक्रोधी परनार्यतिभोगकृत् ।।७।।
लग्नेश १२वें या ८वें भाव में हो तो जातक जूआ खेलने वाला, चोर, क्रोधी और परस्त्रीगामी होता है।।८।।
कारक श्लोक
सूर्यो गुरुः कुजः सोमो गुरुर्भौमः सितः शनिः।।३७।। गुरुश्चन्द्रसुतो जीवो मन्दश्च भावकारकः।।३७।। पुनस्तन्वादयो भावाः स्थाप्यास्तेषां शुभाऽशुभम्। लाभं तृतीयं रन्ध्रं च शत्रुभावव्ययं तथा। एषां योगेन यो भावस्तन्नाशं प्राप्नुयाद्ध्रुवम्।।३८।।
संस्करण की टीकाक्रम से सूर्य, गुरु, भौम, बुध, गुरु, भौम, शुक्र, शनि, गुरु, बुध, गुरु और शनि ये लग्नादि भावों के कारक होते हैं।।३७।। फिर भी लाभ आदि भावों के शुभ-अशुभ को लिखकर उनके शुभाशुभ का निर्णय करना चाहिए। एकादश, तृतीय, आठवाँ, छठवाँ और बारहवाँ भाव— इनके साथ जिस भाव का सम्बन्ध होता है उस भाव के फल का नाश हो जाता है अर्थात् इन भावों के स्पष्ट दृश्यादि का योग करने से जो भाव बने वह नष्ट हो जाता है।।३८।।
प्रश्न
प्रथम भाव किसका सूचक है?
प्रथम भाव के लिए फलदीपिका की सूची ऊपर पूरी उद्धृत है; इसका कारक ग्रह सूर्य है, और इससे सम्बन्धित किसी भी प्रश्न के लिए SIA पहले इसके स्वामी की स्थिति पढ़ता है।
प्रथम भावेश कहाँ शुभ या अशुभ है?
पराशर बारह स्थितियों की श्रेणी नहीं बनाते; वे हर एक का फल कहते हैं, और अध्याय के अन्तिम श्लोक कहते हैं कि हर फल स्वामी के बल के अनुसार घटता-बढ़ता है। SIA निर्णय छापने से पहले स्थिति को स्वामी के षड्बल के साथ तौलता है।
ये श्लोक अपनी कुंडली पर लागू होते देखिए।
SIA में अपनी कुंडली बनाइए — व्याख्या की हर पंक्ति के साथ उसका श्लोक।
सम्बन्धित
हर चिह्न SIA के भण्डार का वास्तविक श्लोक-क्रमांक है — वही चिह्न जो ऐप अपनी व्याख्याओं के साथ छापता है। · अद्यतन
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