गुरु — Guru
गुरु कालपुरुष में ज्ञान और सुख देते हैं और सभा में मन्त्री हैं: लम्बी देह, पिंगल, कफ प्रकृति, सर्वशास्त्रज्ञ। वे विद्या, पुण्य और संतान के कारक हैं, धनु और मीन के स्वामी, और शुक्र-शनि के बाद सबसे लम्बी विंशोत्तरी अवधि — सोलह वर्ष — रखते हैं।
एक दृष्टि में
- ग्रह-सभा में पद
- मन्त्रीBPHS C02.2
- कालपुरुष में
- ज्ञान और सुखBPHS C02.1
- कारक
- विद्या, पुण्यBPHS C42.1
- वर्ण और रूप
- गौर वर्णBPHS C02.4
- अधिदेवता
- इन्द्रBPHS C02.5
- तत्त्व
- आकाशBPHS C02.6
- वर्ण (जाति)
- ब्राह्मणBPHS C02.7
- गुण
- सत्त्वBPHS C02.8
- लिंग
- पुरुषBPHS C02.8b
- रस
- मधुरBPHS C02.17
- शरीर-धातु
- वसाBPHS C02.20b
- स्थान
- कोशBPHS C02.21b
- वस्त्र
- पीताम्बरBPHS C02.23
- ऋतु
- हेमन्तBPHS C02.26
- धातु · मूल · जीव
- जीवBPHS C02.27
- उच्च
- कर्क 5°BPHS C02.38b
- नीच
- मकर 5°BPHS C02.39b
- मूलत्रिकोण
- धनु 0°–10°BPHS C02.29
- स्वराशि
- धनु · मीनBPHS C01.17
- नैसर्गिक मित्र
- सूर्य · चन्द्र · मंगलBPHS C02.31
- सम
- शनिBPHS C02.31
- नैसर्गिक शत्रु
- बुध · शुक्रBPHS C02.31
- विंशोत्तरी वर्ष
- 16 वर्ष (120 में से)BPHS C29.80
- नक्षत्र (विंशोत्तरी स्वामित्व)
- पुनर्वसु · विशाखा · पूर्वाभाद्रपदागणित
पराशर गुरु पर
बृहद्गात्रो गुरुश्चैव पिङ्गलो मूर्धजेक्षणः। कफप्रकृतिको धीमान् सर्वशास्त्रविशारदः।।१६।।
संस्करण की टीकागुरु— लम्बी शरीर, पीले शिर के केश और दृष्टि वाला, कफ प्रकृति, बुद्धिमान्, सभी शास्त्रों का जाननेवाला है।
राजानौ भानुहिमगू नेता ज्ञेयो धरात्मजः। बुधो राजकुमारश्च सचिवौ गुरुभार्गवौ।।३।।
संस्करण की टीकाग्रहों में सूर्य और चन्द्रमा राजा, मंगल नेता, बुध राजकुमार, गुरु और शुक्र मन्त्री हैं।
समौ सिताकीं शशिजश्च शत्रुर्मित्राणि शेषाः पृथिवीसुतस्य। शत्रुः शशी सूर्यसितौ च मित्रे समापरे स्युःशशिनन्दनस्य।।४५।।
संस्करण की टीकाभौम के शुक्र-शनि सम हैं, बुध शत्रु, शुक्र और शेष ग्रह मित्र हैं। बुध के चन्द्रमा शत्रु, सूर्य-शुक्र मित्र और शेष ग्रह सम हैं।
फलदीपिका — कारकत्व और रूप
ज्ञानं सद्गुणमात्मजं च सचिवं स्वाचारमाचार्यकं माहात्म्यं श्रुतिशास्त्रधीस्मृतिमतिं सर्वोन्नतिं सद्गतिम् । देवब्राह्मणभक्तिमध्वरतपःश्रद्धाश्च कोशस्थलं वैदुष्यं विजितेन्द्रियं धवसुखं संमानमीड्याद्दयाम् ॥५॥
संस्करण की टीकाज्ञान, पुत्र, सद्गुण, मन्त्री, व्यक्ति के आचार, अध्यापन, श्रेष्ठता (महत्ता), वेद, शास्त्र और स्मृति आदि का ज्ञान, सर्वाङ्गीण विकास, सद्गति, देवता और ब्राह्मण में भक्ति, धार्मिक अनुष्ठान, यज्ञ, तप, श्रद्धा, कोशागार, विद्वत्ता, इन्द्रियनिग्रह, पतिसुख, सम्मान और दया का विचार बृहस्पति से करना चाहिए ॥५॥
पीतद्युतिः पिङ्गकचेक्षणः स्यात् पीनोन्नतोराश्च बृहच्छरीरः । कफात्मकः श्रेष्ठमतिः सुरेड्यः सिंहाब्जनादश्च वसुप्रधानः ॥१२॥
संस्करण की टीकापीत आभा से युक्त, पिङ्गल (भूरे) नेत्र और केश, स्थूल और उभरा हुआ वक्ष, बृहदाकार शरीर ऐसा देवगुरु बृहस्पति का स्वरूप है । वह कफ-प्रधान प्रकृति, श्रेष्ठ बुद्धि से युक्त, सिंह और शंख की ध्वनि के समान इसकी आवाज है । यह धनोत्सुक होता है ॥१२॥ 'वसुप्रधानः' के स्थान पर कहीं-कहीं 'वसाप्रधानः' पाठान्तर मिलता है । उस स्थिति में 'वसा पर अधिकार होता है' ऐसा अर्थ होगा ।
SIA इसके साथ क्या करता है
SIA जन्म-क्षण के लिए गुरु का निरयन भोगांश अपने सूर्यसिद्धान्त मॉडल से निकालता है, उसे राशि, भाव और सभी सोलह वर्गों में रखता है, उसकी अवस्था बताता है, और अपने भण्डार का हर वह नियम लागू करता है जिसकी शर्त गुरु को नामित करती है — हर एक अपने श्लोक के साथ। ग्रह की स्थिति और दशा-अवधियाँ नि:शुल्क कुंडली-दृश्य का भाग हैं।
प्रश्न
गुरु किन राशियों के स्वामी हैं?
धनु और मीन
गुरु की विंशोत्तरी दशा कितने वर्ष की है?
120 वर्ष के चक्र में 16 वर्ष, नियत क्रम सूर्य, चन्द्र, मंगल, राहु, गुरु, शनि, बुध, केतु, शुक्र में।
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सम्बन्धित
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