भाव 7/12 · yuvati

सप्तम भाव — युवति

सप्तम भाव युवति भाव है। फलदीपिका इसकी संज्ञाएँ गिनाती है, और भाव उसी से जाना जाता है जिस पर उसका अधिकार है। इसका नैसर्गिक कारक शुक्र है। नीचे वह पहला साक्षी है जिसे सिया इस भाव के किसी भी विषय के लिए पढ़ती है: पराशर का कथन कि इसका स्वामी बारह स्थानों में से हर एक से क्या करता है — पूरी तालिका, हर कोष्ठक में एक श्लोक।

एक दृष्टि में

क्रमांक
7 / 12गणित
शास्त्रीय संज्ञा
युवति भावPHAL C1.13
कारक ग्रह
शुक्रBPHS C13.21
मेष लग्न में यहाँ की राशि
तुलागणित

फलदीपिका — भाव की संज्ञाएँ

PHAL C1.13फलदीपिका · Phaladīpikā 1.13

ऋणास्त्रचोरक्षतरोगशत्रून् ज्ञात्याजिदुष्कृत्यघभीत्यवज्ञाः । जामित्रचित्तोत्थमदास्तकामान् द्यूनाध्वलोकान् पतिमार्गभार्याः ॥

संस्करण की टीकाऋण, अस्त्र, चोर, क्षत (घाव, चोट), रोग, शत्रु, ज्ञाति (सगोत्रिय), अजि (युद्ध, विवाद, झगड़ा), दुष्कृति (दुष्कर्म), अघ (पापकर्म), भीति (भय) और अवज्ञा (मानहानि, अपमान)--ये छठे भाव के पर्याय हैं। जामित्र, चित्तोत्थ, मद (कामवासना), अस्त, काम, द्यून, अध्व (मार्ग), लोक, पति और भार्या (स्त्री)--ये सप्तम भाव के पर्याय हैं ॥१३॥

इस भाव का स्वामी बारह भावों में

पराशर का भावेशफल अध्याय बताता है कि किसी भाव का स्वामी हर स्थान से क्या करता है। इस भाव के स्वामी के लिए सिया यही पंक्तियाँ लागू करती है — हर कोष्ठक में एक श्लोक, जैसा छपा है।

प्रथम भाव मेंBPHS C16.36

सप्तमेशो तनौ चास्ते परजायासु लम्पटः। दुष्टो विचक्षणो धीरो वातरुक् स्थीयते हृदि।।५०।।

सप्तमेश लग्न या सप्तम में हो तो जातक परस्त्री में आसक्त, दुष्ट, पंडित, वातरोगी होता है।।५०।।

द्वितीय भाव मेंBPHS C16.37

द्यूनेशे नवमे वित्ते नानास्त्रीभिः समागमः। आरम्भी दीर्घसूत्री च स्त्रीषु चित्तं हि केवलम्।।५१।।

सप्तमेश नवम और दूसरे भाव में हो तो अनेक स्त्रियों में आसक्त, कार्य को आरंभ करने वाला, दीर्घसूत्री और केवल स्त्री में चित्त को लगाने वाला होता है।।५१।।

तृतीय भाव मेंBPHS C16.37b

द्यूनेशे सहजे लाभे मृतपुत्रः प्रजायते। कदाचिज्जीवति सुता यत्नात्पुत्रोऽपि जायते।।५२।।

सप्तमेश ३रे या ११वें भाव में हो तो जातक के संतान नहीं जीते हैं। कदाचित् कन्या जीती है, यत्न करने से पुत्र भी जीता है।।५२।।

चतुर्थ भाव मेंBPHS C16.37c

द्यूनेशे दशमे तुर्ये नास्य जाया पतिव्रता। धर्मात्मा सत्यसंयुक्तः केवलं दन्तरोगवान्।।५३।।

सप्तमेश दशम या चतुर्थ भाव में हो तो जातक की स्त्री पतिव्रता नहीं होती है। जातक सर्वगुणसम्पन्न, मानी और सर्व सम्पत्तिमान् होता है।।५३।।

पञ्चम भाव मेंBPHS C16.38d

सर्वगुणयुतो मानी भवेत्सर्वधनाधिपः। सदैव हर्षसंयुक्तः सप्तमेशे सुते स्थिते।।५४।।

सप्तमेश पाँचवें भाव में हो तो जातक सभी गुणों से युक्त, मानी, सभी प्रकार के धनों से युक्त, सदैव प्रसन्न रहने वाला होता है।।५४।।

षष्ठ भाव मेंBPHS C16.38b

जायेशो चाष्टमे षष्ठे रोगिणी कामिनी लभेत्। क्रोधयुक्तो भवेद्वापि न सुखं लभते क्वचित्।।५५।।

सप्तमेश ६ या ८ भाव में हो तो जातक की स्त्री रोगिणी होती है। जातक क्रोधी होता है और सुखी नहीं रहता है।।५५।।

सप्तम भाव मेंBPHS C16.36

सप्तमेशो तनौ चास्ते परजायासु लम्पटः। दुष्टो विचक्षणो धीरो वातरुक् स्थीयते हृदि।।५०।।

सप्तमेश लग्न या सप्तम में हो तो जातक परस्त्री में आसक्त, दुष्ट, पंडित, वातरोगी होता है।।५०।।

अष्टम भाव मेंBPHS C16.38b

जायेशो चाष्टमे षष्ठे रोगिणी कामिनी लभेत्। क्रोधयुक्तो भवेद्वापि न सुखं लभते क्वचित्।।५५।।

सप्तमेश ६ या ८ भाव में हो तो जातक की स्त्री रोगिणी होती है। जातक क्रोधी होता है और सुखी नहीं रहता है।।५५।।

नवम भाव मेंBPHS C16.37

द्यूनेशे नवमे वित्ते नानास्त्रीभिः समागमः। आरम्भी दीर्घसूत्री च स्त्रीषु चित्तं हि केवलम्।।५१।।

सप्तमेश नवम और दूसरे भाव में हो तो अनेक स्त्रियों में आसक्त, कार्य को आरंभ करने वाला, दीर्घसूत्री और केवल स्त्री में चित्त को लगाने वाला होता है।।५१।।

दशम भाव मेंBPHS C16.37c

द्यूनेशे दशमे तुर्ये नास्य जाया पतिव्रता। धर्मात्मा सत्यसंयुक्तः केवलं दन्तरोगवान्।।५३।।

सप्तमेश दशम या चतुर्थ भाव में हो तो जातक की स्त्री पतिव्रता नहीं होती है। जातक सर्वगुणसम्पन्न, मानी और सर्व सम्पत्तिमान् होता है।।५३।।

एकादश भाव मेंBPHS C16.37b

द्यूनेशे सहजे लाभे मृतपुत्रः प्रजायते। कदाचिज्जीवति सुता यत्नात्पुत्रोऽपि जायते।।५२।।

सप्तमेश ३रे या ११वें भाव में हो तो जातक के संतान नहीं जीते हैं। कदाचित् कन्या जीती है, यत्न करने से पुत्र भी जीता है।।५२।।

द्वादश भाव मेंBPHS C16.38c

द्वादशस्थे सप्तमेशे दरिद्रः कृपणो महान्। चारुकन्या भवेद्भार्या वस्त्राज्जीवी च निर्धनी।।५६।।

सप्तमेश १२वें भाव में हो तो जातक दरिद्र, अत्यंत कृपण, स्त्री सुंदरी, और वस्त्र से जीविका करने वाला निर्धन होता है।।५६।।

कारक श्लोक

BPHS C13.21बृहत् पराशर होरा शास्त्र · अथ कारकाध्यायः v37, folio 110

सूर्यो गुरुः कुजः सोमो गुरुर्भौमः सितः शनिः।।३७।। गुरुश्चन्द्रसुतो जीवो मन्दश्च भावकारकः।।३७।। पुनस्तन्वादयो भावाः स्थाप्यास्तेषां शुभाऽशुभम्। लाभं तृतीयं रन्ध्रं च शत्रुभावव्ययं तथा। एषां योगेन यो भावस्तन्नाशं प्राप्नुयाद्ध्रुवम्।।३८।।

संस्करण की टीकाक्रम से सूर्य, गुरु, भौम, बुध, गुरु, भौम, शुक्र, शनि, गुरु, बुध, गुरु और शनि ये लग्नादि भावों के कारक होते हैं।।३७।। फिर भी लाभ आदि भावों के शुभ-अशुभ को लिखकर उनके शुभाशुभ का निर्णय करना चाहिए। एकादश, तृतीय, आठवाँ, छठवाँ और बारहवाँ भाव— इनके साथ जिस भाव का सम्बन्ध होता है उस भाव के फल का नाश हो जाता है अर्थात् इन भावों के स्पष्ट दृश्यादि का योग करने से जो भाव बने वह नष्ट हो जाता है।।३८।।

प्रश्न

सप्तम भाव किसका सूचक है?

सप्तम भाव के लिए फलदीपिका की सूची ऊपर पूरी उद्धृत है; इसका कारक ग्रह शुक्र है, और इससे सम्बन्धित किसी भी प्रश्न के लिए सिया पहले इसके स्वामी की स्थिति पढ़ती है।

सप्तम भावेश कहाँ शुभ या अशुभ है?

पराशर बारह स्थितियों की श्रेणी नहीं बनाते; वे हर एक का फल कहते हैं, और अध्याय के अन्तिम श्लोक कहते हैं कि हर फल स्वामी के बल के अनुसार घटता-बढ़ता है। सिया निर्णय छापने से पहले स्थिति को स्वामी के षड्बल के साथ तौलती है।

ये श्लोक अपनी कुंडली पर लागू होते देखिए।

सिया में अपनी कुंडली बनाइए — व्याख्या की हर पंक्ति के साथ उसका श्लोक।

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