अष्टम भाव — रन्ध्र
अष्टम भाव रन्ध्र भाव है। फलदीपिका इसकी संज्ञाएँ गिनाती है, और भाव उसी से जाना जाता है जिस पर उसका अधिकार है। इसका नैसर्गिक कारक शनि है। नीचे वह पहला साक्षी है जिसे SIA इस भाव के किसी भी विषय के लिए पढ़ता है: पराशर का कथन कि इसका स्वामी बारह स्थानों में से हर एक से क्या करता है — पूरी तालिका, हर कोष्ठक में एक श्लोक।
एक दृष्टि में
- क्रमांक
- 8 / 12गणित
- शास्त्रीय संज्ञा
- रन्ध्र भावPHAL C1.14
- कारक ग्रह
- शनिBPHS C13.21
- मेष लग्न में यहाँ की राशि
- वृश्चिकगणित
फलदीपिका — भाव की संज्ञाएँ
माङ्गल्यरन्ध्रमलिनाधिपराभवायुःक्लेशापवादमरणाशुचिविघ्नदासान् । आचार्यदैवतपितॄन् शुभपूर्वेभाग्यपूजातपःसुकृतपौत्रजपार्यवंशान् ॥१४॥
संस्करण की टीकामांगल्य, रन्ध्र, मलिन, आधि, पराभव, आयु, क्लेश, अपवाद, मृत्यु, अशुचि, विघ्न और दास--ये अष्टम भाव के पर्याय हैं। आचार्य, दैवत (देवता), पितृ, शुभ, पूर्वभाग्य, पूजा, तप, सुकृत, पौत्र, जप और आर्यवंश--ये नवम भाव की संज्ञाएं हैं ॥१४॥
इस भाव का स्वामी बारह भावों में
पराशर का भावेशफल अध्याय बताता है कि किसी भाव का स्वामी हर स्थान से क्या करता है। इस भाव के स्वामी के लिए SIA यही पंक्तियाँ लागू करता है — हर कोष्ठक में एक श्लोक, जैसा छपा है।
अष्टमेशे तनौ कामे भार्यायुग्मं समादिशेत्। विष्णुद्रोहरतो नित्यं व्रणरोगी प्रजायते।।५७।।
अष्टमेश लग्न या सातवें भाव में हो तो जातक की दो स्त्रियाँ होती हैं। सदा विष्णु का द्रोह करने वाला और व्रणरोगी होता है।।५७।।
धनं तस्य भवेत्स्वल्पं गतं वित्तं न लभ्यते। अष्टमेशे धने बाहुबलहीनः प्रजायते।।५८।।
अष्टमेश धनस्थान में हो तो जातक अल्प धन वाला, बाहुबल से हीन और नष्ट हुए द्रव्य को न पाने वाला होता है।।५८।।
अष्टमेशे तृतीये चेत् भ्रातृहीनो भवेन्नरः। बन्धुद्वेषी सुहृद्द्वेषी व्यङ्गो दुर्बलदेहभाक्।।५९।।
अष्टमेश तीसरे भाव में हो तो जातक भ्रातृहीन, बंधुओं से द्वेष करने वाला, अंगहीन और दुर्बल शरीर का होता है।।५९।।
अष्टमेशे सुखे कर्मपिशुनो बन्धुवर्जितः। मातापित्रोर्भवेन्मृत्युः स्वल्पकालेन भीतियुक्।।६०।।
अष्टमेश चौथे भाव में हो तो जातक कर्महीन, बंधुहीन और थोड़ी अवस्था में ही मातृ-पितृविहीन होता है।।६०।।
अष्टमेशो सुते लाभे तस्य वृद्धिर्न जायते। द्रव्यं न स्थीयते गेहे स्थिरबुद्धिर्भवेज्जनः।।६१।।
अष्टमेश पाँचवें या ग्यारहवें भाव में हो तो जातक बुद्धिहीन, द्रव्यहीन और मूर्ख होता है।।६१।।
अष्टमेशे व्यये षष्ठे नित्यं रोगी प्रजायते। जलसर्पादिकाद्घातो भवेत्तस्य च शैशवे।।६२।।
अष्टमेश छठे या बारहवें भाव में हो तो जातक सदा रोगी, शैशव अवस्था में जल या सर्प भय से पीड़ित होता है।।६२।।
अष्टमेशे तनौ कामे भार्यायुग्मं समादिशेत्। विष्णुद्रोहरतो नित्यं व्रणरोगी प्रजायते।।५७।।
अष्टमेश लग्न या सातवें भाव में हो तो जातक की दो स्त्रियाँ होती हैं। सदा विष्णु का द्रोह करने वाला और व्रणरोगी होता है।।५७।।
द्यूती चौरोऽन्यथावादी गुरुनिन्दासु तत्परः। अष्टमेशोऽष्टमस्थाने भार्या पररता भवेत्।।६३।।
अष्टमेश अष्टम भाव में हो तो जातक की स्त्री दूसरे में आसक्त होती है और वह जुआड़ी, चोर, असत्य बोलने वाला और गुरु की निंदा करने वाला होता है।।६३।।
अष्टमेशे तपः स्थाने महापापी च नास्तिकः। सुतहा ह्यथवा वन्ध्या परभार्याधने रुचिः।।६४।।
अष्टमेश नवम भाव में हो तो जातक महापापी, नास्तिक, पुत्रनाशक, वा वंध्या और परस्त्री एवं परधनलोलुप होता है।।६४।।
अष्टमेशे स्थिते माने नीचकर्मप्रवृत्तिवान्। प्रेष्यो च जारजो क्रूरो मातृहीनो भवेन्नरः।।६५।।
अष्टमेश दशमभाव में हो तो जातक नीच कर्म में रत, दासकर्म करने वाला, जार से उत्पन्न, क्रूर और मातृसुख से हीन होता है।।६५।।
अष्टमेशो सुते लाभे तस्य वृद्धिर्न जायते। द्रव्यं न स्थीयते गेहे स्थिरबुद्धिर्भवेज्जनः।।६१।।
अष्टमेश पाँचवें या ग्यारहवें भाव में हो तो जातक बुद्धिहीन, द्रव्यहीन और मूर्ख होता है।।६१।।
अष्टमेशे व्यये षष्ठे नित्यं रोगी प्रजायते। जलसर्पादिकाद्घातो भवेत्तस्य च शैशवे।।६२।।
अष्टमेश छठे या बारहवें भाव में हो तो जातक सदा रोगी, शैशव अवस्था में जल या सर्प भय से पीड़ित होता है।।६२।।
कारक श्लोक
सूर्यो गुरुः कुजः सोमो गुरुर्भौमः सितः शनिः।।३७।। गुरुश्चन्द्रसुतो जीवो मन्दश्च भावकारकः।।३७।। पुनस्तन्वादयो भावाः स्थाप्यास्तेषां शुभाऽशुभम्। लाभं तृतीयं रन्ध्रं च शत्रुभावव्ययं तथा। एषां योगेन यो भावस्तन्नाशं प्राप्नुयाद्ध्रुवम्।।३८।।
संस्करण की टीकाक्रम से सूर्य, गुरु, भौम, बुध, गुरु, भौम, शुक्र, शनि, गुरु, बुध, गुरु और शनि ये लग्नादि भावों के कारक होते हैं।।३७।। फिर भी लाभ आदि भावों के शुभ-अशुभ को लिखकर उनके शुभाशुभ का निर्णय करना चाहिए। एकादश, तृतीय, आठवाँ, छठवाँ और बारहवाँ भाव— इनके साथ जिस भाव का सम्बन्ध होता है उस भाव के फल का नाश हो जाता है अर्थात् इन भावों के स्पष्ट दृश्यादि का योग करने से जो भाव बने वह नष्ट हो जाता है।।३८।।
प्रश्न
अष्टम भाव किसका सूचक है?
अष्टम भाव के लिए फलदीपिका की सूची ऊपर पूरी उद्धृत है; इसका कारक ग्रह शनि है, और इससे सम्बन्धित किसी भी प्रश्न के लिए SIA पहले इसके स्वामी की स्थिति पढ़ता है।
अष्टम भावेश कहाँ शुभ या अशुभ है?
पराशर बारह स्थितियों की श्रेणी नहीं बनाते; वे हर एक का फल कहते हैं, और अध्याय के अन्तिम श्लोक कहते हैं कि हर फल स्वामी के बल के अनुसार घटता-बढ़ता है। SIA निर्णय छापने से पहले स्थिति को स्वामी के षड्बल के साथ तौलता है।
ये श्लोक अपनी कुंडली पर लागू होते देखिए।
SIA में अपनी कुंडली बनाइए — व्याख्या की हर पंक्ति के साथ उसका श्लोक।
सम्बन्धित
हर चिह्न SIA के भण्डार का वास्तविक श्लोक-क्रमांक है — वही चिह्न जो ऐप अपनी व्याख्याओं के साथ छापता है। · अद्यतन
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