नवम भाव — धर्म
नवम भाव धर्म भाव है। फलदीपिका इसकी संज्ञाएँ गिनाती है, और भाव उसी से जाना जाता है जिस पर उसका अधिकार है। इसका नैसर्गिक कारक गुरु है। नीचे वह पहला साक्षी है जिसे SIA इस भाव के किसी भी विषय के लिए पढ़ता है: पराशर का कथन कि इसका स्वामी बारह स्थानों में से हर एक से क्या करता है — पूरी तालिका, हर कोष्ठक में एक श्लोक।
एक दृष्टि में
- क्रमांक
- 9 / 12गणित
- शास्त्रीय संज्ञा
- धर्म भावPHAL C1.14
- कारक ग्रह
- गुरुBPHS C13.21
- मेष लग्न में यहाँ की राशि
- धनुगणित
फलदीपिका — भाव की संज्ञाएँ
माङ्गल्यरन्ध्रमलिनाधिपराभवायुःक्लेशापवादमरणाशुचिविघ्नदासान् । आचार्यदैवतपितॄन् शुभपूर्वेभाग्यपूजातपःसुकृतपौत्रजपार्यवंशान् ॥१४॥
संस्करण की टीकामांगल्य, रन्ध्र, मलिन, आधि, पराभव, आयु, क्लेश, अपवाद, मृत्यु, अशुचि, विघ्न और दास--ये अष्टम भाव के पर्याय हैं। आचार्य, दैवत (देवता), पितृ, शुभ, पूर्वभाग्य, पूजा, तप, सुकृत, पौत्र, जप और आर्यवंश--ये नवम भाव की संज्ञाएं हैं ॥१४॥
इस भाव का स्वामी बारह भावों में
पराशर का भावेशफल अध्याय बताता है कि किसी भाव का स्वामी हर स्थान से क्या करता है। इस भाव के स्वामी के लिए SIA यही पंक्तियाँ लागू करता है — हर कोष्ठक में एक श्लोक, जैसा छपा है।
भाग्येशे च मदे कल्पे गुणवान्कीर्त्तिमान्भवेत्। कदाचिन्न भवेत्सिद्धं यत्कार्यं कर्त्तुमिच्छति।।६६।।
भाग्येश लग्न या सप्तम भाव में हो तो जातक गुणी, कीर्तियुक्त होता है। उसे जिस कार्य की इच्छा होती है वह कभी सिद्ध नहीं होता है।।६६।।
भाग्येशे सहजे वित्ते सदा भाग्यानुचिन्तकः। धनवान् गुणवान्कामी पण्डितो जनवल्लभः।।६७।।
भाग्येश तीसरे या दूसरे भाव में हो तो जातक सदा भाग्यवान्, धनी, गुणी, कामी, पंडित और जनवल्लभ होता है।।६७।।
भाग्येशे सहजे वित्ते सदा भाग्यानुचिन्तकः। धनवान् गुणवान्कामी पण्डितो जनवल्लभः।।६७।।
भाग्येश तीसरे या दूसरे भाव में हो तो जातक सदा भाग्यवान्, धनी, गुणी, कामी, पंडित और जनवल्लभ होता है।।६७।।
भाग्येशे दशमे तुर्ये मन्त्री सेनापतिर्भवेत्। पुण्यवान्सुयशो वाग्मी साहसी क्रोधवर्जितः।।६८।।
भाग्येश दशम या चतुर्थ भाव में हो तो जातक मंत्री वा सेनापति, पुण्यवान्, यशस्वी, बुद्धिमान्, साहसी और क्रोध रहित होता है।।६८।।
भाग्येशे पञ्चमे लाभे भाग्यवान् जनवल्लभः। गुरुभक्तिरतो मानी धीरो धीरगुणैर्युतः।।६९।।
भाग्येश पाँचवें या लाभ भाव में हो तो जातक भाग्यवान्, जनता का प्रेमी, गुरु की भक्ति में आसक्त, मानी तथा धीर होता है।।६९।।
भाग्येशे त्रिकभावे चेत्भाग्यहीनो भवेन्नरः। मातुलस्य सुखं न स्याज्ज्येष्ठभ्रातृसुखं तथा।।७०।।
भाग्येश ६, ८, १२ भावों में हो तो जातक भाग्यहीन, माता के और ज्येष्ठ भाई के सुख से हीन होता है।।७०।।
भाग्येशे च मदे कल्पे गुणवान्कीर्त्तिमान्भवेत्। कदाचिन्न भवेत्सिद्धं यत्कार्यं कर्त्तुमिच्छति।।६६।।
भाग्येश लग्न या सप्तम भाव में हो तो जातक गुणी, कीर्तियुक्त होता है। उसे जिस कार्य की इच्छा होती है वह कभी सिद्ध नहीं होता है।।६६।।
भाग्येशे त्रिकभावे चेत्भाग्यहीनो भवेन्नरः। मातुलस्य सुखं न स्याज्ज्येष्ठभ्रातृसुखं तथा।।७०।।
भाग्येश ६, ८, १२ भावों में हो तो जातक भाग्यहीन, माता के और ज्येष्ठ भाई के सुख से हीन होता है।।७०।।
अध्याय में नहीं कहा गया — SIA पंक्ति बनाने के बदले इस कोष्ठक के लिए कुछ नहीं छापता।
भाग्येशे दशमे तुर्ये मन्त्री सेनापतिर्भवेत्। पुण्यवान्सुयशो वाग्मी साहसी क्रोधवर्जितः।।६८।।
भाग्येश दशम या चतुर्थ भाव में हो तो जातक मंत्री वा सेनापति, पुण्यवान्, यशस्वी, बुद्धिमान्, साहसी और क्रोध रहित होता है।।६८।।
भाग्येशे पञ्चमे लाभे भाग्यवान् जनवल्लभः। गुरुभक्तिरतो मानी धीरो धीरगुणैर्युतः।।६९।।
भाग्येश पाँचवें या लाभ भाव में हो तो जातक भाग्यवान्, जनता का प्रेमी, गुरु की भक्ति में आसक्त, मानी तथा धीर होता है।।६९।।
भाग्येशे त्रिकभावे चेत्भाग्यहीनो भवेन्नरः। मातुलस्य सुखं न स्याज्ज्येष्ठभ्रातृसुखं तथा।।७०।।
भाग्येश ६, ८, १२ भावों में हो तो जातक भाग्यहीन, माता के और ज्येष्ठ भाई के सुख से हीन होता है।।७०।।
कारक श्लोक
सूर्यो गुरुः कुजः सोमो गुरुर्भौमः सितः शनिः।।३७।। गुरुश्चन्द्रसुतो जीवो मन्दश्च भावकारकः।।३७।। पुनस्तन्वादयो भावाः स्थाप्यास्तेषां शुभाऽशुभम्। लाभं तृतीयं रन्ध्रं च शत्रुभावव्ययं तथा। एषां योगेन यो भावस्तन्नाशं प्राप्नुयाद्ध्रुवम्।।३८।।
संस्करण की टीकाक्रम से सूर्य, गुरु, भौम, बुध, गुरु, भौम, शुक्र, शनि, गुरु, बुध, गुरु और शनि ये लग्नादि भावों के कारक होते हैं।।३७।। फिर भी लाभ आदि भावों के शुभ-अशुभ को लिखकर उनके शुभाशुभ का निर्णय करना चाहिए। एकादश, तृतीय, आठवाँ, छठवाँ और बारहवाँ भाव— इनके साथ जिस भाव का सम्बन्ध होता है उस भाव के फल का नाश हो जाता है अर्थात् इन भावों के स्पष्ट दृश्यादि का योग करने से जो भाव बने वह नष्ट हो जाता है।।३८।।
प्रश्न
नवम भाव किसका सूचक है?
नवम भाव के लिए फलदीपिका की सूची ऊपर पूरी उद्धृत है; इसका कारक ग्रह गुरु है, और इससे सम्बन्धित किसी भी प्रश्न के लिए SIA पहले इसके स्वामी की स्थिति पढ़ता है।
नवम भावेश कहाँ शुभ या अशुभ है?
पराशर बारह स्थितियों की श्रेणी नहीं बनाते; वे हर एक का फल कहते हैं, और अध्याय के अन्तिम श्लोक कहते हैं कि हर फल स्वामी के बल के अनुसार घटता-बढ़ता है। SIA निर्णय छापने से पहले स्थिति को स्वामी के षड्बल के साथ तौलता है।
ये श्लोक अपनी कुंडली पर लागू होते देखिए।
SIA में अपनी कुंडली बनाइए — व्याख्या की हर पंक्ति के साथ उसका श्लोक।
सम्बन्धित
हर चिह्न SIA के भण्डार का वास्तविक श्लोक-क्रमांक है — वही चिह्न जो ऐप अपनी व्याख्याओं के साथ छापता है। · अद्यतन
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