दशम भाव — कर्म
दशम भाव कर्म भाव है। फलदीपिका इसकी संज्ञाएँ गिनाती है, और भाव उसी से जाना जाता है जिस पर उसका अधिकार है। इसका नैसर्गिक कारक बुध है। नीचे वह पहला साक्षी है जिसे SIA इस भाव के किसी भी विषय के लिए पढ़ता है: पराशर का कथन कि इसका स्वामी बारह स्थानों में से हर एक से क्या करता है — पूरी तालिका, हर कोष्ठक में एक श्लोक।
एक दृष्टि में
- क्रमांक
- 10 / 12गणित
- शास्त्रीय संज्ञा
- कर्म भावPHAL C1.15
- कारक ग्रह
- बुधBPHS C13.21
- मेष लग्न में यहाँ की राशि
- मकरगणित
फलदीपिका — भाव की संज्ञाएँ
व्यापारास्पदमानकर्मजयसत्कीर्तिं कृतुं जीवनं व्योमाचारगुणप्रवृत्तिगमनान्याज्ञां च मेषूरणम् । लाभायागमनाप्तिसिद्धिविभवान् प्राप्तिं भवं श्लाघ्यतां ज्येष्ठभ्रातरमन्यकर्णसरसान् सन्तोषमाकर्णनम् ॥१५॥
संस्करण की टीकाव्यापार, आस्पद (पद), मान (सम्मान, प्रतिष्ठा), कर्म (व्यवसाय), जय (सफलता), सत् (शुभ), कीर्ति, क्रतु (यज्ञादि धार्मिक अनुष्ठान), जीवन (जीविकोपार्जन), व्योम (ऊर्ध्वाकाश), आचार (पेशा या व्यवसाय), गुण, प्रवृत्ति, गमन, आज्ञा (प्रशासन) और मेषूरण--ये दशम भाव की संज्ञाएं हैं। लाभ, आय, आगमन, आप्ति (प्राप्ति), सिद्धि (कार्य की सफलता), विभव (वैभव), प्राप्ति, भव, श्लाघ्यता, ज्येष्ठ भ्राता या भगिनी, वामकर्ण, सरस (रसमय पदार्थ), सन्तोष और शुभश्रवण--ये एकादश भाव की संज्ञाएं हैं ॥१५॥
इस भाव का स्वामी बारह भावों में
पराशर का भावेशफल अध्याय बताता है कि किसी भाव का स्वामी हर स्थान से क्या करता है। इस भाव के स्वामी के लिए SIA यही पंक्तियाँ लागू करता है — हर कोष्ठक में एक श्लोक, जैसा छपा है।
कर्मेशाधिपतौ लग्ने कवितागुणसंयुतः। बाल्ये रोगी सुखी पश्चादर्थवृद्धिर्दिने दिने।।७१।।
कर्मेश लग्न में हो तो जातक कविता करने वाला, बाल्यकाल में रोगी, पीछे सुखी और प्रतिदिन धन में वृद्धि वाला होता है।।७१।।
धने मदे च सहजे कर्मेशो यदि संस्थितः। मनस्वी गुणवान् वाग्मी सत्यधर्मसमन्वितः।।७२।।
कर्मेश २, ३, ७ भावों में हो तो जातक मनस्वी, गुणी, बुद्धिमान् और सत्य बोलने वाला होता है।।७२।।
धने मदे च सहजे कर्मेशो यदि संस्थितः। मनस्वी गुणवान् वाग्मी सत्यधर्मसमन्वितः।।७२।।
कर्मेश २, ३, ७ भावों में हो तो जातक मनस्वी, गुणी, बुद्धिमान् और सत्य बोलने वाला होता है।।७२।।
दशमेशे सुखे कर्मे ज्ञानवान्सुखविक्रमी। गुरुदेवार्चनरतो धर्मात्मा सत्यसंयुतः।।७३।।
कर्मेश चौथे वा दशम भाव में हो तो जातक ज्ञानी, सुखी, विक्रमी, गुरु-देवता के पूजन में रत, धर्मात्मा और सत्यवादी होता है।।७३।।
दशमेशे सुते लाभे धनवान् पुत्रवान् भवेत्। सर्वदा हर्षसंयुक्तः सत्यवादी सुखी नरः।।७४।।
कर्मेश पाँचवें या एकादश भाव में हो तो जातक धनी, पुत्रवान्, सर्वदा प्रसन्नचित्त, सत्यवादी और सुखी होता है।।७४।।
कर्मेशोऽरिव्यये यस्य शत्रुभिः परिपीडितः। चातुर्यगुणसम्पन्नः क्वचिच्च न सुखी नरः।।७५।।
कर्मेश छठे या बारहवें भाव में हो तो जातक शत्रुओं से पीडित, चतुर और कभी सुखी न रहने वाला होता है।।७५।।
धने मदे च सहजे कर्मेशो यदि संस्थितः। मनस्वी गुणवान् वाग्मी सत्यधर्मसमन्वितः।।७२।।
कर्मेश २, ३, ७ भावों में हो तो जातक मनस्वी, गुणी, बुद्धिमान् और सत्य बोलने वाला होता है।।७२।।
कर्मेशो रन्ध्रगे जातो क्रूरो चौरोऽथवा धूर्त्तः। अल्पायुरसद्युक्तो मातृसन्तापकारकः।।७६।।
कर्मेश आठवें भाव में हो तो जातक क्रूर, चोर अथवा धूर्त्त और झूठ बोलने वाला और माता को संताप देने वाला होता है।।७६।।
कर्मेशो नवमे यस्य स भवेत्कुलपालकः। सद्बन्धुमित्रसंयुक्तः मातृभक्तोऽथ पूजकः।।७७।।
कर्मेश नवम भाव में हो तो जातक कुलपालक श्रेष्ठ, बन्धु-मित्र से युक्त और मातृभक्त होता है।।७७।।
दशमेशे सुखे कर्मे ज्ञानवान्सुखविक्रमी। गुरुदेवार्चनरतो धर्मात्मा सत्यसंयुतः।।७३।।
कर्मेश चौथे वा दशम भाव में हो तो जातक ज्ञानी, सुखी, विक्रमी, गुरु-देवता के पूजन में रत, धर्मात्मा और सत्यवादी होता है।।७३।।
दशमेशे सुते लाभे धनवान् पुत्रवान् भवेत्। सर्वदा हर्षसंयुक्तः सत्यवादी सुखी नरः।।७४।।
कर्मेश पाँचवें या एकादश भाव में हो तो जातक धनी, पुत्रवान्, सर्वदा प्रसन्नचित्त, सत्यवादी और सुखी होता है।।७४।।
कर्मेशोऽरिव्यये यस्य शत्रुभिः परिपीडितः। चातुर्यगुणसम्पन्नः क्वचिच्च न सुखी नरः।।७५।।
कर्मेश छठे या बारहवें भाव में हो तो जातक शत्रुओं से पीडित, चतुर और कभी सुखी न रहने वाला होता है।।७५।।
कारक श्लोक
सूर्यो गुरुः कुजः सोमो गुरुर्भौमः सितः शनिः।।३७।। गुरुश्चन्द्रसुतो जीवो मन्दश्च भावकारकः।।३७।। पुनस्तन्वादयो भावाः स्थाप्यास्तेषां शुभाऽशुभम्। लाभं तृतीयं रन्ध्रं च शत्रुभावव्ययं तथा। एषां योगेन यो भावस्तन्नाशं प्राप्नुयाद्ध्रुवम्।।३८।।
संस्करण की टीकाक्रम से सूर्य, गुरु, भौम, बुध, गुरु, भौम, शुक्र, शनि, गुरु, बुध, गुरु और शनि ये लग्नादि भावों के कारक होते हैं।।३७।। फिर भी लाभ आदि भावों के शुभ-अशुभ को लिखकर उनके शुभाशुभ का निर्णय करना चाहिए। एकादश, तृतीय, आठवाँ, छठवाँ और बारहवाँ भाव— इनके साथ जिस भाव का सम्बन्ध होता है उस भाव के फल का नाश हो जाता है अर्थात् इन भावों के स्पष्ट दृश्यादि का योग करने से जो भाव बने वह नष्ट हो जाता है।।३८।।
प्रश्न
दशम भाव किसका सूचक है?
दशम भाव के लिए फलदीपिका की सूची ऊपर पूरी उद्धृत है; इसका कारक ग्रह बुध है, और इससे सम्बन्धित किसी भी प्रश्न के लिए SIA पहले इसके स्वामी की स्थिति पढ़ता है।
दशम भावेश कहाँ शुभ या अशुभ है?
पराशर बारह स्थितियों की श्रेणी नहीं बनाते; वे हर एक का फल कहते हैं, और अध्याय के अन्तिम श्लोक कहते हैं कि हर फल स्वामी के बल के अनुसार घटता-बढ़ता है। SIA निर्णय छापने से पहले स्थिति को स्वामी के षड्बल के साथ तौलता है।
ये श्लोक अपनी कुंडली पर लागू होते देखिए।
SIA में अपनी कुंडली बनाइए — व्याख्या की हर पंक्ति के साथ उसका श्लोक।
सम्बन्धित
हर चिह्न SIA के भण्डार का वास्तविक श्लोक-क्रमांक है — वही चिह्न जो ऐप अपनी व्याख्याओं के साथ छापता है। · अद्यतन
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