भाव 11/12 · labha

एकादश भाव — लाभ

एकादश भाव लाभ भाव है। फलदीपिका इसकी संज्ञाएँ गिनाती है, और भाव उसी से जाना जाता है जिस पर उसका अधिकार है। इसका नैसर्गिक कारक गुरु है। नीचे वह पहला साक्षी है जिसे SIA इस भाव के किसी भी विषय के लिए पढ़ता है: पराशर का कथन कि इसका स्वामी बारह स्थानों में से हर एक से क्या करता है — पूरी तालिका, हर कोष्ठक में एक श्लोक।

एक दृष्टि में

क्रमांक
11 / 12गणित
शास्त्रीय संज्ञा
लाभ भावPHAL C1.15
कारक ग्रह
गुरुBPHS C13.21
मेष लग्न में यहाँ की राशि
कुम्भगणित

फलदीपिका — भाव की संज्ञाएँ

PHAL C1.15फलदीपिका · Phaladīpikā 1.15

व्यापारास्पदमानकर्मजयसत्कीर्तिं कृतुं जीवनं व्योमाचारगुणप्रवृत्तिगमनान्याज्ञां च मेषूरणम् । लाभायागमनाप्तिसिद्धिविभवान् प्राप्तिं भवं श्लाघ्यतां ज्येष्ठभ्रातरमन्यकर्णसरसान् सन्तोषमाकर्णनम् ॥१५॥

संस्करण की टीकाव्यापार, आस्पद (पद), मान (सम्मान, प्रतिष्ठा), कर्म (व्यवसाय), जय (सफलता), सत् (शुभ), कीर्ति, क्रतु (यज्ञादि धार्मिक अनुष्ठान), जीवन (जीविकोपार्जन), व्योम (ऊर्ध्वाकाश), आचार (पेशा या व्यवसाय), गुण, प्रवृत्ति, गमन, आज्ञा (प्रशासन) और मेषूरण--ये दशम भाव की संज्ञाएं हैं। लाभ, आय, आगमन, आप्ति (प्राप्ति), सिद्धि (कार्य की सफलता), विभव (वैभव), प्राप्ति, भव, श्लाघ्यता, ज्येष्ठ भ्राता या भगिनी, वामकर्ण, सरस (रसमय पदार्थ), सन्तोष और शुभश्रवण--ये एकादश भाव की संज्ञाएं हैं ॥१५॥

इस भाव का स्वामी बारह भावों में

पराशर का भावेशफल अध्याय बताता है कि किसी भाव का स्वामी हर स्थान से क्या करता है। इस भाव के स्वामी के लिए SIA यही पंक्तियाँ लागू करता है — हर कोष्ठक में एक श्लोक, जैसा छपा है।

प्रथम भाव मेंBPHS C16.49d

लाभेशे संस्थिते लग्ने धनवान्सात्त्विको महान्। समदृष्टिर्महान्वक्ता कौतुको च भवेत्सदा।।७८।।

लाभेश लग्न में हो तो जातक धनी, सात्त्विक, समदृष्टि, वक्ता और कौतुकी होता है।।७८।।

द्वितीय भाव मेंBPHS C16.50

लाभेशे च धने पुत्रे नानासुखसमन्वितः। पुत्रवान्धार्मिकश्चैव सर्वसिद्धियुतः पुमान्।।७९।।

लाभेश दूसरे या पाँचवें भाव में हो तो जातक अनेक सुखों से युक्त, पुत्रवान्, धार्मिक और सभी पदार्थों से युक्त होता है।।७९।।

तृतीय भाव मेंBPHS C16.50b

लाभेशे सहजे तुर्ये तीर्थेषु तत्परो महान्। कुशलः सर्वकार्येषु केवलं शूलरोगवान्।।८०।।

लाभेश तीसरे या चौथे भाव में हो तो जातक तीर्थयात्रा में तत्पर, सभी कार्यों में कुशल और शूलरोग से युक्त होता है।।८०।।

चतुर्थ भाव मेंBPHS C16.50b

लाभेशे सहजे तुर्ये तीर्थेषु तत्परो महान्। कुशलः सर्वकार्येषु केवलं शूलरोगवान्।।८०।।

लाभेश तीसरे या चौथे भाव में हो तो जातक तीर्थयात्रा में तत्पर, सभी कार्यों में कुशल और शूलरोग से युक्त होता है।।८०।।

पञ्चम भाव मेंBPHS C16.50

लाभेशे च धने पुत्रे नानासुखसमन्वितः। पुत्रवान्धार्मिकश्चैव सर्वसिद्धियुतः पुमान्।।७९।।

लाभेश दूसरे या पाँचवें भाव में हो तो जातक अनेक सुखों से युक्त, पुत्रवान्, धार्मिक और सभी पदार्थों से युक्त होता है।।७९।।

षष्ठ भाव मेंBPHS C16.51

लाभेशे षष्ठभवने नानारोगसमन्वितः। सर्वं सुखं भवेत्तस्य प्रवासी परसेवकः।।८१।।

लाभेश छठे भाव में हो तो जातक अनेक रोगों से युक्त, प्रवासी और दूसरे का नौकर होता है।।८१।।

सप्तम भाव मेंBPHS C16.51b

लाभेशे सप्तमे रन्ध्रे भार्या तस्य न जीवति। उदारो गुणवान्कर्मी मूर्खो भवति निश्चितम्।।८२।।

लाभेश सातवें या आठवें भाव में हो तो जातक की स्त्री नहीं होती है। वह गुणी, उदार और मूर्ख होता है।।८२।।

अष्टम भाव मेंBPHS C16.51b

लाभेशे सप्तमे रन्ध्रे भार्या तस्य न जीवति। उदारो गुणवान्कर्मी मूर्खो भवति निश्चितम्।।८२।।

लाभेश सातवें या आठवें भाव में हो तो जातक की स्त्री नहीं होती है। वह गुणी, उदार और मूर्ख होता है।।८२।।

नवम भाव मेंBPHS C16.52

लाभेशो गगने धर्मे राजपूज्यो धनाधिपः। चतुरः सत्यवादी च निजधर्मसमन्वितः।।८३।।

लाभेश दशम या नवम भाव में हो तो जातक राजा से पूज्य, धनी, चतुर, सत्यवक्ता और अपने धर्म से युत होता है।।८३।।

दशम भाव मेंBPHS C16.52

लाभेशो गगने धर्मे राजपूज्यो धनाधिपः। चतुरः सत्यवादी च निजधर्मसमन्वितः।।८३।।

लाभेश दशम या नवम भाव में हो तो जातक राजा से पूज्य, धनी, चतुर, सत्यवक्ता और अपने धर्म से युत होता है।।८३।।

एकादश भाव मेंBPHS C16.52b

लाभेशो संस्थिते लाभे स वाग्मी भवति ध्रुवम्। पाण्डित्यं कविता चैव वर्धते च दिने दिने।।८४।।

लाभेश लाभ भाव में हो तो जातक बुद्धिमान्, पंडित और कवि होता है।।८४।।

द्वादश भाव मेंBPHS C16.52c

प्राप्तिस्थानाधिपे रिःफे म्लेच्छसंसर्गकारकः। कामुको बहुकान्तश्च क्षणिको लम्पटः सदा।।८५।।

लाभेश बारहवें भाव में हो तो जातक नीचों से संसर्ग करने वाला, कामी, अनेक स्त्रियों वाला और लम्पट होता है।।८५।।

कारक श्लोक

BPHS C13.21बृहत् पराशर होरा शास्त्र · अथ कारकाध्यायः v37, folio 110

सूर्यो गुरुः कुजः सोमो गुरुर्भौमः सितः शनिः।।३७।। गुरुश्चन्द्रसुतो जीवो मन्दश्च भावकारकः।।३७।। पुनस्तन्वादयो भावाः स्थाप्यास्तेषां शुभाऽशुभम्। लाभं तृतीयं रन्ध्रं च शत्रुभावव्ययं तथा। एषां योगेन यो भावस्तन्नाशं प्राप्नुयाद्ध्रुवम्।।३८।।

संस्करण की टीकाक्रम से सूर्य, गुरु, भौम, बुध, गुरु, भौम, शुक्र, शनि, गुरु, बुध, गुरु और शनि ये लग्नादि भावों के कारक होते हैं।।३७।। फिर भी लाभ आदि भावों के शुभ-अशुभ को लिखकर उनके शुभाशुभ का निर्णय करना चाहिए। एकादश, तृतीय, आठवाँ, छठवाँ और बारहवाँ भाव— इनके साथ जिस भाव का सम्बन्ध होता है उस भाव के फल का नाश हो जाता है अर्थात् इन भावों के स्पष्ट दृश्यादि का योग करने से जो भाव बने वह नष्ट हो जाता है।।३८।।

प्रश्न

एकादश भाव किसका सूचक है?

एकादश भाव के लिए फलदीपिका की सूची ऊपर पूरी उद्धृत है; इसका कारक ग्रह गुरु है, और इससे सम्बन्धित किसी भी प्रश्न के लिए SIA पहले इसके स्वामी की स्थिति पढ़ता है।

एकादश भावेश कहाँ शुभ या अशुभ है?

पराशर बारह स्थितियों की श्रेणी नहीं बनाते; वे हर एक का फल कहते हैं, और अध्याय के अन्तिम श्लोक कहते हैं कि हर फल स्वामी के बल के अनुसार घटता-बढ़ता है। SIA निर्णय छापने से पहले स्थिति को स्वामी के षड्बल के साथ तौलता है।

ये श्लोक अपनी कुंडली पर लागू होते देखिए।

SIA में अपनी कुंडली बनाइए — व्याख्या की हर पंक्ति के साथ उसका श्लोक।

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