भाव 12/12 · vyaya

द्वादश भाव — व्यय

द्वादश भाव व्यय भाव है। फलदीपिका इसकी संज्ञाएँ गिनाती है, और भाव उसी से जाना जाता है जिस पर उसका अधिकार है। इसका नैसर्गिक कारक शनि है। नीचे वह पहला साक्षी है जिसे सिया इस भाव के किसी भी विषय के लिए पढ़ती है: पराशर का कथन कि इसका स्वामी बारह स्थानों में से हर एक से क्या करता है — पूरी तालिका, हर कोष्ठक में एक श्लोक।

एक दृष्टि में

क्रमांक
12 / 12गणित
शास्त्रीय संज्ञा
व्यय भावPHAL C1.16
कारक ग्रह
शनिBPHS C13.21
मेष लग्न में यहाँ की राशि
मीनगणित

फलदीपिका — भाव की संज्ञाएँ

PHAL C1.16फलदीपिका · Phaladīpikā 1.16

दुःखांघ्रिवामनयनक्षयसूचकान्त्यदारिद्र्यपापशयनव्ययरिःफबन्धान् । भावाह्वयानि गदिताः क्रमशोऽथ लीनस्थानं त्रिषड्व्ययपराभवराशिनाम् ॥१६॥

संस्करण की टीकादुःख, अंघ्रि (पैर), बायीं आंख, क्षय (हानि), सूचक (संवादवाहक), अन्त्य, दारिद्र्य, पाप (पापकर्म), शयन (बिछावन), व्यय, रिष्फ और बन्धन--ये द्वादश भाव के पर्याय हैं। ये क्रमशः द्वादश भावों के विभिन्न नाम हैं। तृतीय, षष्ठ, अष्टम और द्वादश भावों को लीन स्थान कहा गया है ॥१६॥

इस भाव का स्वामी बारह भावों में

पराशर का भावेशफल अध्याय बताता है कि किसी भाव का स्वामी हर स्थान से क्या करता है। इस भाव के स्वामी के लिए सिया यही पंक्तियाँ लागू करती है — हर कोष्ठक में एक श्लोक, जैसा छपा है।

प्रथम भाव मेंBPHS C16.53

व्ययेशो मदने लग्ने जायासौख्यं भवेन्न हि। दुर्बलः कफरोगी च धनविद्याविवर्जितः।।८६।।

व्ययेश सातवें या लग्न में हो तो जातक को स्त्री का सुख नहीं होता है। जातक दुर्बल, कफरोगी और धन-विद्या से हीन होता है।।८६।।

द्वितीय भाव मेंBPHS C16.53b

व्ययेशे च धने रन्ध्रे विष्णुभक्तिसमन्वितः। धार्मिकः प्रियवादी च सम्पूर्णगुणसंयुतः।।८७।।

व्ययेश दूसरे या आठवें भाव में हो तो जातक विष्णुभक्त, धार्मिक, प्रियभाषी, गुणी होता है।।८७।।

तृतीय भाव मेंBPHS C16.53c

भार्याद्वेषी प्रियद्वेषी गुरुद्वेषी भवेन्नरः। व्ययेशे सहजे धर्मे स्वशरीरस्य पोषकः।।८८।।

व्ययेश तीसरे या नवम भाव में हो तो जातक अपने शरीर का पोषक, स्त्रीद्वेषी, मित्रद्रोही और गुरुद्रोही होता है।।८८।।

चतुर्थ भाव मेंBPHS C16.54

पुत्रहीनो महादुःखी तीर्थाटनपरो भवेत्। कृपणो रोगयुक्तश्च व्ययेशे च सुते सुखे।।८९।।

व्ययेश पाँचवें या चौथे भाव में हो तो जातक पुत्र रहित, महादुःखी, तीर्थाटन करने वाला, कृपण और रोगी होता है।।८९।।

पञ्चम भाव मेंBPHS C16.54

पुत्रहीनो महादुःखी तीर्थाटनपरो भवेत्। कृपणो रोगयुक्तश्च व्ययेशे च सुते सुखे।।८९।।

व्ययेश पाँचवें या चौथे भाव में हो तो जातक पुत्र रहित, महादुःखी, तीर्थाटन करने वाला, कृपण और रोगी होता है।।८९।।

षष्ठ भाव मेंBPHS C16.54b

व्ययेशोऽरिव्यये पापी मातृमृत्युविचिन्तकः। क्रोधी सन्तानदुःखी च परजायासु लम्पटः।।९०।।

व्ययेश छठें या बारहवें भाव में हो तो जातक पापी, माता के मृत्यु का कारण, क्रोधी, संतान से कष्ट और परस्त्रीगामी होता है।।९०।।

सप्तम भाव मेंBPHS C16.53

व्ययेशो मदने लग्ने जायासौख्यं भवेन्न हि। दुर्बलः कफरोगी च धनविद्याविवर्जितः।।८६।।

व्ययेश सातवें या लग्न में हो तो जातक को स्त्री का सुख नहीं होता है। जातक दुर्बल, कफरोगी और धन-विद्या से हीन होता है।।८६।।

अष्टम भाव मेंBPHS C16.53b

व्ययेशे च धने रन्ध्रे विष्णुभक्तिसमन्वितः। धार्मिकः प्रियवादी च सम्पूर्णगुणसंयुतः।।८७।।

व्ययेश दूसरे या आठवें भाव में हो तो जातक विष्णुभक्त, धार्मिक, प्रियभाषी, गुणी होता है।।८७।।

नवम भाव मेंBPHS C16.53c

भार्याद्वेषी प्रियद्वेषी गुरुद्वेषी भवेन्नरः। व्ययेशे सहजे धर्मे स्वशरीरस्य पोषकः।।८८।।

व्ययेश तीसरे या नवम भाव में हो तो जातक अपने शरीर का पोषक, स्त्रीद्वेषी, मित्रद्रोही और गुरुद्रोही होता है।।८८।।

दशम भाव मेंBPHS C16.54c

व्ययेशे दशमे लाभे पुत्रसौख्यं भवेन्न हि । मणिमाणिक्यमुक्तादि धत्ते किञ्चित्समालभेत् ।।९१।।

व्ययेश दशम या एकादश भाव में हो तो जातक पुत्रसुख से हीन, मणि-माणिक्य आदि के होते हुए भी सुखहीन होता है।।९१।।

एकादश भाव मेंBPHS C16.54c

व्ययेशे दशमे लाभे पुत्रसौख्यं भवेन्न हि । मणिमाणिक्यमुक्तादि धत्ते किञ्चित्समालभेत् ।।९१।।

व्ययेश दशम या एकादश भाव में हो तो जातक पुत्रसुख से हीन, मणि-माणिक्य आदि के होते हुए भी सुखहीन होता है।।९१।।

द्वादश भाव मेंBPHS C16.54b

व्ययेशोऽरिव्यये पापी मातृमृत्युविचिन्तकः। क्रोधी सन्तानदुःखी च परजायासु लम्पटः।।९०।।

व्ययेश छठें या बारहवें भाव में हो तो जातक पापी, माता के मृत्यु का कारण, क्रोधी, संतान से कष्ट और परस्त्रीगामी होता है।।९०।।

कारक श्लोक

BPHS C13.21बृहत् पराशर होरा शास्त्र · अथ कारकाध्यायः v37, folio 110

सूर्यो गुरुः कुजः सोमो गुरुर्भौमः सितः शनिः।।३७।। गुरुश्चन्द्रसुतो जीवो मन्दश्च भावकारकः।।३७।। पुनस्तन्वादयो भावाः स्थाप्यास्तेषां शुभाऽशुभम्। लाभं तृतीयं रन्ध्रं च शत्रुभावव्ययं तथा। एषां योगेन यो भावस्तन्नाशं प्राप्नुयाद्ध्रुवम्।।३८।।

संस्करण की टीकाक्रम से सूर्य, गुरु, भौम, बुध, गुरु, भौम, शुक्र, शनि, गुरु, बुध, गुरु और शनि ये लग्नादि भावों के कारक होते हैं।।३७।। फिर भी लाभ आदि भावों के शुभ-अशुभ को लिखकर उनके शुभाशुभ का निर्णय करना चाहिए। एकादश, तृतीय, आठवाँ, छठवाँ और बारहवाँ भाव— इनके साथ जिस भाव का सम्बन्ध होता है उस भाव के फल का नाश हो जाता है अर्थात् इन भावों के स्पष्ट दृश्यादि का योग करने से जो भाव बने वह नष्ट हो जाता है।।३८।।

प्रश्न

द्वादश भाव किसका सूचक है?

द्वादश भाव के लिए फलदीपिका की सूची ऊपर पूरी उद्धृत है; इसका कारक ग्रह शनि है, और इससे सम्बन्धित किसी भी प्रश्न के लिए सिया पहले इसके स्वामी की स्थिति पढ़ती है।

द्वादश भावेश कहाँ शुभ या अशुभ है?

पराशर बारह स्थितियों की श्रेणी नहीं बनाते; वे हर एक का फल कहते हैं, और अध्याय के अन्तिम श्लोक कहते हैं कि हर फल स्वामी के बल के अनुसार घटता-बढ़ता है। सिया निर्णय छापने से पहले स्थिति को स्वामी के षड्बल के साथ तौलती है।

ये श्लोक अपनी कुंडली पर लागू होते देखिए।

सिया में अपनी कुंडली बनाइए — व्याख्या की हर पंक्ति के साथ उसका श्लोक।

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