नक्षत्र 1/27 · Ashwini

अश्विनी नक्षत्र — Aśvinī

अश्विनी सत्ताईस नक्षत्रों में 1वाँ है, निरयन राशिचक्र में 0° से 13°20′ तक का 13°20′ का खण्ड, मेष के भीतर। यहाँ जन्मा चन्द्र विंशोत्तरी चक्र केतु की दशा (7 वर्ष) से खोलता है, खण्ड का केवल शेष भाग बचा रहता है। कुंडली मिलान में इसका गण देव, योनि अश्व (घोड़ा), नाड़ी आदि है।

एक दृष्टि में

क्रमांक
1 / 27गणित
विस्तार
0° – 13°20′ (13°20′)गणित
राशि
मेषगणित
चरण (नवांश राशि)
1: मेष · 2: वृषभ · 3: मिथुन · 4: कर्कBPHS shodashavarga.11
स्वामी (विंशोत्तरी)
केतुBPHS C29.80
विंशोत्तरी वर्ष
7BPHS C29.80
गण
देवMILAN.GANA
योनि
अश्व (घोड़ा)MILAN.YONI
नाड़ी
आदिMILAN.NADI

ग्रंथों में इसका नाम

नीचे के श्लोक वे स्थान हैं जहाँ SIA का भण्डार इस नक्षत्र का नाम छापता है; ऊपर के दशा और मेलापक नियम वह सिद्धान्त हैं जिससे SIA गणना करता है।

BPHS C29.78बृहत् पराशर होरा शास्त्र · दशाध्यायः v12, folio 375

आनयनप्रकारं च शृणुष्व द्विजपुङ्गव। नामनक्षत्रपर्य्यन्तमार्क्षादि कृत्तिकादितः।।१२।।

संस्करण की टीकाहे द्विजश्रेष्ठ! उसके आनयन प्रकार को कह रहा हूँ। कृत्तिका से राशिनाम पर्यन्त ही गिनना चाहिए।।१२।।

BPHS C29.80बृहत् पराशर होरा शास्त्र · दशाध्यायः v14, folio 375

सूर्येन्दुक्ष्माजतमसो वाक्पतिर्मन्दचन्द्रजा। केतुशुक्रौ क्रमादेते विज्ञेयाश्च दशाधिपाः।।१४।।

संस्करण की टीकाक्रम से सूर्य, चन्द्र, भौम, राहु, गुरु, शनि, बुध, केतु, शुक्र की दशा होती है।।१४।।

BPHS C49.34बृहत् पराशर होरा शास्त्र · अब्दचर्याध्यायः v7, folio 707

दस्रश्च मृगशीर्षश्च शर्वः पुष्यश्च सैंद्रभम् । उत्तराविश्वजिच्छ्रोणी चित्रा पुष्यश्च वायुभम् ।।७।। अभिजिद्वसुभं पौष्णं कृत्तिका च पुनर्वसुः । पूर्वोत्तरप्रोष्ठपदौ शततारा च विश्वभम् ।।८।।

संस्करण की टीकाअश्विनी, मृगशिरा, आर्द्रा, पुष्य, आर्द्रा, उत्तरा, पूर्वाषाढ़, श्रवण, चित्रा, पुष्य, स्वाती।।७।। अभिजित्, धनिष्ठा, रेवती, कृत्तिका, पुनर्वसु, पूर्वाभाद्रपद, उत्तरा भाद्रपद, शतभिष, उत्तराषाढ।।८।।

PHAL C7.8फलदीपिका · Phaladīpikā 7.8

अश्विन्यामुदयगतो भृगुर्ग्रहेन्द्रैर्दृष्टश्चेज्जनयति भूपतिं जितारिम् । नीचार्योर्गृहमपहाय वित्तसंस्थो लग्नेशः सह कविना वली च भूपम् ॥

संस्करण की टीकालग्नस्थ शुक्र यदि अश्विनी नक्षत्र में स्थित होकर तीन ग्रहों से दृष्ट हो तो इस योग में उत्पन्न व्यक्ति शत्रुञ्जयी राजा होता है । यदि लग्न का स्वामी शुक्र के साथ द्वितीय भाव में स्थित हो और द्वितीयभावस्थ राशि उनके शत्रु की अथवा उनकी नीच राशि न हो तथा लग्नेश बलवान् हो तो ऐसे योग में उत्पन्न व्यक्ति राजा होता है ॥८॥

मेलापक सिद्धान्त

MILAN.GANAमेलापक सिद्धान्त · मुहूर्त चिन्तामणि परम्परा · Melāpaka · Gaṇa kūṭa (Vivāha-prakaraṇa tradition)

भावार्थगण (6 गुण) — हर नक्षत्र देव, मनुष्य या राक्षस गण (स्वभाव-वर्ग) का है। एक ही गण 6; देव–मनुष्य 5–6; देव–राक्षस 1; मनुष्य–राक्षस 0। यहाँ का बेमेल (गण दोष) मूल स्वभाव के टकराव का संकेत है, जो चन्द्र-राशि स्वामियों की मित्रता से कम होता है।

MILAN.YONIमेलापक सिद्धान्त · मुहूर्त चिन्तामणि परम्परा · Melāpaka · Yoni kūṭa (Vivāha-prakaraṇa tradition)

भावार्थयोनि (4 गुण) — हर नक्षत्र का एक पशु-स्वभाव है (अश्व, गज, मेष, सर्प, श्वान, मार्जार, मूषक, गो, महिष, व्याघ्र, मृग, वानर, नकुल, सिंह)। एक ही योनि 4; मित्र योनियाँ 3; सम 2; अमित्र 1; शत्रु-जोड़े (अश्व–महिष, गज–सिंह, मेष–वानर, सर्प–नकुल, श्वान–मृग, मार्जार–मूषक, गो–व्याघ्र) 0। यह सहज, शारीरिक अनुकूलता का माप है।

MILAN.NADIमेलापक सिद्धान्त · मुहूर्त चिन्तामणि परम्परा · Melāpaka · Nāḍī kūṭa (Vivāha-prakaraṇa tradition)

भावार्थनाड़ी (8 गुण) — सबसे भारी कूट। 27 नक्षत्र तीन नाड़ियों (आदि, मध्य, अन्त्य) में चक्र से बँटे हैं — शरीर-प्रकृति की धारा। भिन्न नाड़ी पूरे 8 देती है; एक ही नाड़ी 0 देती है और नाड़ी दोष है, मेलापक की सबसे गम्भीर आपत्ति (संतान और स्वास्थ्य से जोड़ी गई)। दोनों चन्द्र एक राशि में भिन्न नक्षत्रों में हों, या एक नक्षत्र में भिन्न चरणों में, तो दोष का शास्त्रीय परिहार है।

प्रश्न

अश्विनी नक्षत्र का स्वामी कौन है?

विंशोत्तरी में केतु — अश्विनी में चन्द्र होने पर पहली महादशा केतु की होती है, पूर्ण रूप में 7 वर्ष।

अश्विनी के गण, योनि और नाड़ी क्या हैं?

गण देव, योनि अश्व (घोड़ा), नाड़ी आदि — कुंडली मिलान के तीन नक्षत्र-आधारित कूट, 6, 4 और 8 गुण के।

अश्विनी किस राशि में है?

मेष — इसके चार चरण नवांश राशियों मेष, वृषभ, मिथुन, कर्क में पड़ते हैं।

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