मूल नक्षत्र — Mūla
मूल सत्ताईस नक्षत्रों में 19वाँ है, निरयन राशिचक्र में 240° से 253°20′ तक का 13°20′ का खण्ड, धनु के भीतर। यहाँ जन्मा चन्द्र विंशोत्तरी चक्र केतु की दशा (7 वर्ष) से खोलता है, खण्ड का केवल शेष भाग बचा रहता है। कुंडली मिलान में इसका गण राक्षस, योनि श्वान (कुत्ता), नाड़ी आदि है।
एक दृष्टि में
- क्रमांक
- 19 / 27गणित
- विस्तार
- 240° – 253°20′ (13°20′)गणित
- राशि
- धनुगणित
- चरण (नवांश राशि)
- 1: मेष · 2: वृषभ · 3: मिथुन · 4: कर्कBPHS shodashavarga.11
- स्वामी (विंशोत्तरी)
- केतुBPHS C29.80
- विंशोत्तरी वर्ष
- 7BPHS C29.80
- गण
- राक्षसMILAN.GANA
- योनि
- श्वान (कुत्ता)MILAN.YONI
- नाड़ी
- आदिMILAN.NADI
ग्रंथों में इसका नाम
नीचे के श्लोक वे स्थान हैं जहाँ SIA का भण्डार इस नक्षत्र का नाम छापता है; ऊपर के दशा और मेलापक नियम वह सिद्धान्त हैं जिससे SIA गणना करता है।
राह्वारपङ्गुचन्द्राश्च विज्ञेया धातुखेचराः। मूलग्रहौ सूर्यशुक्रौ अपरा जीवसंज्ञकाः।।३६।।
संस्करण की टीकाराहु, भौम और चन्द्रमा धातु के स्वामी, सूर्य-शुक्र मूल के स्वामी और शेष बुध, गुरु, केतु जीव के स्वामी हैं।
विंशतिरंशाः सिंहे कोणमपरे स्वभवनमर्कस्य। उच्चं भागत्रितयं वृषमिन्दोः शेषांशास्युस्त्रिकोणकाः।।४०।।
संस्करण की टीकासूर्य का सिंह राशि में २० अंश तक मूलत्रिकोण है, शेष १० अंश स्वराशि है। चन्द्रमा का वृष राशि के आरम्भ से ३ अंश तक उच्च है, इसके बाद के अंश मूलत्रिकोण हैं।
मेलापक सिद्धान्त
भावार्थगण (6 गुण) — हर नक्षत्र देव, मनुष्य या राक्षस गण (स्वभाव-वर्ग) का है। एक ही गण 6; देव–मनुष्य 5–6; देव–राक्षस 1; मनुष्य–राक्षस 0। यहाँ का बेमेल (गण दोष) मूल स्वभाव के टकराव का संकेत है, जो चन्द्र-राशि स्वामियों की मित्रता से कम होता है।
भावार्थयोनि (4 गुण) — हर नक्षत्र का एक पशु-स्वभाव है (अश्व, गज, मेष, सर्प, श्वान, मार्जार, मूषक, गो, महिष, व्याघ्र, मृग, वानर, नकुल, सिंह)। एक ही योनि 4; मित्र योनियाँ 3; सम 2; अमित्र 1; शत्रु-जोड़े (अश्व–महिष, गज–सिंह, मेष–वानर, सर्प–नकुल, श्वान–मृग, मार्जार–मूषक, गो–व्याघ्र) 0। यह सहज, शारीरिक अनुकूलता का माप है।
भावार्थनाड़ी (8 गुण) — सबसे भारी कूट। 27 नक्षत्र तीन नाड़ियों (आदि, मध्य, अन्त्य) में चक्र से बँटे हैं — शरीर-प्रकृति की धारा। भिन्न नाड़ी पूरे 8 देती है; एक ही नाड़ी 0 देती है और नाड़ी दोष है, मेलापक की सबसे गम्भीर आपत्ति (संतान और स्वास्थ्य से जोड़ी गई)। दोनों चन्द्र एक राशि में भिन्न नक्षत्रों में हों, या एक नक्षत्र में भिन्न चरणों में, तो दोष का शास्त्रीय परिहार है।
प्रश्न
मूल नक्षत्र का स्वामी कौन है?
विंशोत्तरी में केतु — मूल में चन्द्र होने पर पहली महादशा केतु की होती है, पूर्ण रूप में 7 वर्ष।
मूल के गण, योनि और नाड़ी क्या हैं?
गण राक्षस, योनि श्वान (कुत्ता), नाड़ी आदि — कुंडली मिलान के तीन नक्षत्र-आधारित कूट, 6, 4 और 8 गुण के।
मूल किस राशि में है?
धनु — इसके चार चरण नवांश राशियों मेष, वृषभ, मिथुन, कर्क में पड़ते हैं।
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