ज्येष्ठा नक्षत्र — Jyeṣṭhā
ज्येष्ठा सत्ताईस नक्षत्रों में 18वाँ है, निरयन राशिचक्र में 226°40′ से 240° तक का 13°20′ का खण्ड, वृश्चिक के भीतर। यहाँ जन्मा चन्द्र विंशोत्तरी चक्र बुध की दशा (17 वर्ष) से खोलता है, खण्ड का केवल शेष भाग बचा रहता है। कुंडली मिलान में इसका गण राक्षस, योनि मृग (हिरण), नाड़ी आदि है।
एक दृष्टि में
- क्रमांक
- 18 / 27गणित
- विस्तार
- 226°40′ – 240° (13°20′)गणित
- राशि
- वृश्चिकगणित
- चरण (नवांश राशि)
- 1: धनु · 2: मकर · 3: कुम्भ · 4: मीनBPHS shodashavarga.11
- स्वामी (विंशोत्तरी)
- बुधBPHS C29.80
- विंशोत्तरी वर्ष
- 17BPHS C29.80
- गण
- राक्षसMILAN.GANA
- योनि
- मृग (हिरण)MILAN.YONI
- नाड़ी
- आदिMILAN.NADI
ग्रंथों में इसका नाम
नीचे के श्लोक वे स्थान हैं जहाँ SIA का भण्डार इस नक्षत्र का नाम छापता है; ऊपर के दशा और मेलापक नियम वह सिद्धान्त हैं जिससे SIA गणना करता है।
तथाक्षवेदभागानामधिपाश्चलभे क्रियात्। स्थिरे सिंहाद्द्विस्वभावे चापाद्ब्रह्मेशकेशवाः। ईशाच्युतसुरज्येष्ठविष्णुकेशाश्चराधिषु।।३०।।
संस्करण की टीकाचर राशि में मेष से, स्थिर राशि में सिंह से और द्विस्वभाव राशि में धन राशि से गणना करने से अक्षवेदांश के स्वामी होते हैं और चर, स्थिर, द्विस्वभाव के क्रम से ब्रह्मा, शंकर, विष्णु; शंकर, विष्णु, ब्रह्मा; विष्णु, ब्रह्मा, शंकर ये स्वामी होते हैं।।३०।। उदाहरण— लग्न ९।१५।२२।३७ है। ४० कला का एक भाग होता है, अतः २४वाँ मीन राशि अर्थात् गुरु का अक्षवेदांश हुआ और विष्णु स्वामी हुए।
मेलापक सिद्धान्त
भावार्थगण (6 गुण) — हर नक्षत्र देव, मनुष्य या राक्षस गण (स्वभाव-वर्ग) का है। एक ही गण 6; देव–मनुष्य 5–6; देव–राक्षस 1; मनुष्य–राक्षस 0। यहाँ का बेमेल (गण दोष) मूल स्वभाव के टकराव का संकेत है, जो चन्द्र-राशि स्वामियों की मित्रता से कम होता है।
भावार्थयोनि (4 गुण) — हर नक्षत्र का एक पशु-स्वभाव है (अश्व, गज, मेष, सर्प, श्वान, मार्जार, मूषक, गो, महिष, व्याघ्र, मृग, वानर, नकुल, सिंह)। एक ही योनि 4; मित्र योनियाँ 3; सम 2; अमित्र 1; शत्रु-जोड़े (अश्व–महिष, गज–सिंह, मेष–वानर, सर्प–नकुल, श्वान–मृग, मार्जार–मूषक, गो–व्याघ्र) 0। यह सहज, शारीरिक अनुकूलता का माप है।
भावार्थनाड़ी (8 गुण) — सबसे भारी कूट। 27 नक्षत्र तीन नाड़ियों (आदि, मध्य, अन्त्य) में चक्र से बँटे हैं — शरीर-प्रकृति की धारा। भिन्न नाड़ी पूरे 8 देती है; एक ही नाड़ी 0 देती है और नाड़ी दोष है, मेलापक की सबसे गम्भीर आपत्ति (संतान और स्वास्थ्य से जोड़ी गई)। दोनों चन्द्र एक राशि में भिन्न नक्षत्रों में हों, या एक नक्षत्र में भिन्न चरणों में, तो दोष का शास्त्रीय परिहार है।
प्रश्न
ज्येष्ठा नक्षत्र का स्वामी कौन है?
विंशोत्तरी में बुध — ज्येष्ठा में चन्द्र होने पर पहली महादशा बुध की होती है, पूर्ण रूप में 17 वर्ष।
ज्येष्ठा के गण, योनि और नाड़ी क्या हैं?
गण राक्षस, योनि मृग (हिरण), नाड़ी आदि — कुंडली मिलान के तीन नक्षत्र-आधारित कूट, 6, 4 और 8 गुण के।
ज्येष्ठा किस राशि में है?
वृश्चिक — इसके चार चरण नवांश राशियों धनु, मकर, कुम्भ, मीन में पड़ते हैं।
ये श्लोक अपनी कुंडली पर लागू होते देखिए।
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