पुष्य नक्षत्र — Puṣya
पुष्य सत्ताईस नक्षत्रों में 8वाँ है, निरयन राशिचक्र में 93°20′ से 106°40′ तक का 13°20′ का खण्ड, कर्क के भीतर। यहाँ जन्मा चन्द्र विंशोत्तरी चक्र शनि की दशा (19 वर्ष) से खोलता है, खण्ड का केवल शेष भाग बचा रहता है। कुंडली मिलान में इसका गण देव, योनि मेष (भेड़), नाड़ी मध्य है।
एक दृष्टि में
- क्रमांक
- 8 / 27गणित
- विस्तार
- 93°20′ – 106°40′ (13°20′)गणित
- राशि
- कर्कगणित
- चरण (नवांश राशि)
- 1: सिंह · 2: कन्या · 3: तुला · 4: वृश्चिकBPHS shodashavarga.11
- स्वामी (विंशोत्तरी)
- शनिBPHS C29.80
- विंशोत्तरी वर्ष
- 19BPHS C29.80
- गण
- देवMILAN.GANA
- योनि
- मेष (भेड़)MILAN.YONI
- नाड़ी
- मध्यMILAN.NADI
ग्रंथों में इसका नाम
नीचे के श्लोक वे स्थान हैं जहाँ SIA का भण्डार इस नक्षत्र का नाम छापता है; ऊपर के दशा और मेलापक नियम वह सिद्धान्त हैं जिससे SIA गणना करता है।
अष्टौ दशाधिपाः प्रोक्ता राहुहीना नवग्रहाः । पुष्यभाज्जन्मभं यावद्गणयेद्वसुभिर्हरेत् ।।१९।।
संस्करण की टीकाराहु को छोड़कर नवग्रह में आठ ही ग्रह दशेश होते हैं। पुष्य से जन्म-नक्षत्र तक गिनने से जो संख्या हो उसमें ८ से भाग देने पर शेषांक तुल्य सूर्य आदि की दशा होती है।।१९।।
सुगन्धपुष्पशय्यादिस्त्रीसौख्यं चातिशोभनम् । महाराजप्रसादेन धनलाभो महद्यशः ।।२६१।।
संस्करण की टीकासुगन्ध पुष्प, शय्या, और स्त्री का सुख होता है, महाराज के प्रसाद से धन का लाभ और बड़ा यश होता है।।२६१।।
मेलापक सिद्धान्त
भावार्थगण (6 गुण) — हर नक्षत्र देव, मनुष्य या राक्षस गण (स्वभाव-वर्ग) का है। एक ही गण 6; देव–मनुष्य 5–6; देव–राक्षस 1; मनुष्य–राक्षस 0। यहाँ का बेमेल (गण दोष) मूल स्वभाव के टकराव का संकेत है, जो चन्द्र-राशि स्वामियों की मित्रता से कम होता है।
भावार्थयोनि (4 गुण) — हर नक्षत्र का एक पशु-स्वभाव है (अश्व, गज, मेष, सर्प, श्वान, मार्जार, मूषक, गो, महिष, व्याघ्र, मृग, वानर, नकुल, सिंह)। एक ही योनि 4; मित्र योनियाँ 3; सम 2; अमित्र 1; शत्रु-जोड़े (अश्व–महिष, गज–सिंह, मेष–वानर, सर्प–नकुल, श्वान–मृग, मार्जार–मूषक, गो–व्याघ्र) 0। यह सहज, शारीरिक अनुकूलता का माप है।
भावार्थनाड़ी (8 गुण) — सबसे भारी कूट। 27 नक्षत्र तीन नाड़ियों (आदि, मध्य, अन्त्य) में चक्र से बँटे हैं — शरीर-प्रकृति की धारा। भिन्न नाड़ी पूरे 8 देती है; एक ही नाड़ी 0 देती है और नाड़ी दोष है, मेलापक की सबसे गम्भीर आपत्ति (संतान और स्वास्थ्य से जोड़ी गई)। दोनों चन्द्र एक राशि में भिन्न नक्षत्रों में हों, या एक नक्षत्र में भिन्न चरणों में, तो दोष का शास्त्रीय परिहार है।
प्रश्न
पुष्य नक्षत्र का स्वामी कौन है?
विंशोत्तरी में शनि — पुष्य में चन्द्र होने पर पहली महादशा शनि की होती है, पूर्ण रूप में 19 वर्ष।
पुष्य के गण, योनि और नाड़ी क्या हैं?
गण देव, योनि मेष (भेड़), नाड़ी मध्य — कुंडली मिलान के तीन नक्षत्र-आधारित कूट, 6, 4 और 8 गुण के।
पुष्य किस राशि में है?
कर्क — इसके चार चरण नवांश राशियों सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक में पड़ते हैं।
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