नक्षत्र 24/27 · Shatabhisha

शतभिषा नक्षत्र — Śatabhiṣā

शतभिषा सत्ताईस नक्षत्रों में 24वाँ है, निरयन राशिचक्र में 306°40′ से 320° तक का 13°20′ का खण्ड, कुम्भ के भीतर। यहाँ जन्मा चन्द्र विंशोत्तरी चक्र राहु की दशा (18 वर्ष) से खोलता है, खण्ड का केवल शेष भाग बचा रहता है। कुंडली मिलान में इसका गण राक्षस, योनि अश्व (घोड़ा), नाड़ी आदि है।

एक दृष्टि में

क्रमांक
24 / 27गणित
विस्तार
306°40′ – 320° (13°20′)गणित
राशि
कुम्भगणित
चरण (नवांश राशि)
1: धनु · 2: मकर · 3: कुम्भ · 4: मीनBPHS shodashavarga.11
स्वामी (विंशोत्तरी)
राहुBPHS C29.80
विंशोत्तरी वर्ष
18BPHS C29.80
गण
राक्षसMILAN.GANA
योनि
अश्व (घोड़ा)MILAN.YONI
नाड़ी
आदिMILAN.NADI

ग्रंथों में इसका नाम

नीचे के श्लोक वे स्थान हैं जहाँ SIA का भण्डार इस नक्षत्र का नाम छापता है; ऊपर के दशा और मेलापक नियम वह सिद्धान्त हैं जिससे SIA गणना करता है।

BPHS C49.33बृहत् पराशर होरा शास्त्र · अब्दचर्याध्यायः v3, folio 707

विशाखा च ततो ज्येष्ठा मूलं च शततारकम् । भरणीपूर्वफाल्गुन्यौ विश्वजिच्च ततो भवेत् ।।३।। उत्तराप्रौष्ठपाच्चैव रेवती च ततः परम् । अभिजिच्चोत्तरा चाथ कृत्तिका रोहिणी ततः ।।४।।

संस्करण की टीकाविशाखा, ज्येष्ठा, मूल, शततारक, भरणी, पूर्वाफाल्गुनी, विश्वजित् अभिजित ये १५ दिन के मुहूर्त हैं।।३।। उत्तराभाद्रपदा, रेवती, अभिजित्, उत्तरा, कृत्तिका, रोहिणी।।४।।

BPHS abdacarya.3बृहत् पराशर होरा शास्त्र · अब्दचर्याध्यायः v3, folio 707

विशाखा च ततो ज्येष्ठा मूलं च शततारकम् । भरणीपूर्वफाल्गुन्यौ विश्वजिच्च ततो भवेत् ।।३।।

संस्करण की टीकाविशाखा, ज्येष्ठा, मूल, शततारक, भरणी, पूर्वाफाल्गुनी, विश्वजित् अभिजित ये १५ दिन के मुहूर्त हैं।।३।।

मेलापक सिद्धान्त

MILAN.GANAमेलापक सिद्धान्त · मुहूर्त चिन्तामणि परम्परा · Melāpaka · Gaṇa kūṭa (Vivāha-prakaraṇa tradition)

भावार्थगण (6 गुण) — हर नक्षत्र देव, मनुष्य या राक्षस गण (स्वभाव-वर्ग) का है। एक ही गण 6; देव–मनुष्य 5–6; देव–राक्षस 1; मनुष्य–राक्षस 0। यहाँ का बेमेल (गण दोष) मूल स्वभाव के टकराव का संकेत है, जो चन्द्र-राशि स्वामियों की मित्रता से कम होता है।

MILAN.YONIमेलापक सिद्धान्त · मुहूर्त चिन्तामणि परम्परा · Melāpaka · Yoni kūṭa (Vivāha-prakaraṇa tradition)

भावार्थयोनि (4 गुण) — हर नक्षत्र का एक पशु-स्वभाव है (अश्व, गज, मेष, सर्प, श्वान, मार्जार, मूषक, गो, महिष, व्याघ्र, मृग, वानर, नकुल, सिंह)। एक ही योनि 4; मित्र योनियाँ 3; सम 2; अमित्र 1; शत्रु-जोड़े (अश्व–महिष, गज–सिंह, मेष–वानर, सर्प–नकुल, श्वान–मृग, मार्जार–मूषक, गो–व्याघ्र) 0। यह सहज, शारीरिक अनुकूलता का माप है।

MILAN.NADIमेलापक सिद्धान्त · मुहूर्त चिन्तामणि परम्परा · Melāpaka · Nāḍī kūṭa (Vivāha-prakaraṇa tradition)

भावार्थनाड़ी (8 गुण) — सबसे भारी कूट। 27 नक्षत्र तीन नाड़ियों (आदि, मध्य, अन्त्य) में चक्र से बँटे हैं — शरीर-प्रकृति की धारा। भिन्न नाड़ी पूरे 8 देती है; एक ही नाड़ी 0 देती है और नाड़ी दोष है, मेलापक की सबसे गम्भीर आपत्ति (संतान और स्वास्थ्य से जोड़ी गई)। दोनों चन्द्र एक राशि में भिन्न नक्षत्रों में हों, या एक नक्षत्र में भिन्न चरणों में, तो दोष का शास्त्रीय परिहार है।

प्रश्न

शतभिषा नक्षत्र का स्वामी कौन है?

विंशोत्तरी में राहु — शतभिषा में चन्द्र होने पर पहली महादशा राहु की होती है, पूर्ण रूप में 18 वर्ष।

शतभिषा के गण, योनि और नाड़ी क्या हैं?

गण राक्षस, योनि अश्व (घोड़ा), नाड़ी आदि — कुंडली मिलान के तीन नक्षत्र-आधारित कूट, 6, 4 और 8 गुण के।

शतभिषा किस राशि में है?

कुम्भ — इसके चार चरण नवांश राशियों धनु, मकर, कुम्भ, मीन में पड़ते हैं।

ये श्लोक अपनी कुंडली पर लागू होते देखिए।

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सम्बन्धित

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