हस्त नक्षत्र — Hasta
हस्त सत्ताईस नक्षत्रों में 13वाँ है, निरयन राशिचक्र में 160° से 173°20′ तक का 13°20′ का खण्ड, कन्या के भीतर। यहाँ जन्मा चन्द्र विंशोत्तरी चक्र चन्द्र की दशा (10 वर्ष) से खोलता है, खण्ड का केवल शेष भाग बचा रहता है। कुंडली मिलान में इसका गण देव, योनि महिष (भैंसा), नाड़ी आदि है।
एक दृष्टि में
- क्रमांक
- 13 / 27गणित
- विस्तार
- 160° – 173°20′ (13°20′)गणित
- राशि
- कन्यागणित
- चरण (नवांश राशि)
- 1: मेष · 2: वृषभ · 3: मिथुन · 4: कर्कBPHS shodashavarga.11
- स्वामी (विंशोत्तरी)
- चन्द्रBPHS C29.80
- विंशोत्तरी वर्ष
- 10BPHS C29.80
- गण
- देवMILAN.GANA
- योनि
- महिष (भैंसा)MILAN.YONI
- नाड़ी
- आदिMILAN.NADI
ग्रंथों में इसका नाम
नीचे के श्लोक वे स्थान हैं जहाँ SIA का भण्डार इस नक्षत्र का नाम छापता है; ऊपर के दशा और मेलापक नियम वह सिद्धान्त हैं जिससे SIA गणना करता है।
यदि पश्येद्ग्रहस्तत्र विपरीतार्गलसंस्थितः। प्रथमां तु विजानीयाद्विपरीतार्गलां द्विज।।२८।।
संस्करण की टीकायदि अर्गला के प्रतिबंधकस्थानीय ग्रह यानि विपरीत अर्गलायोग कारक ग्रह देखते हों तो विपरीत फल होता है।।२८।।
सुते सुतं विजानीयाद्दारा सप्तमभावतः। सुतस्थाने ग्रहस्तिष्ठेत्सोऽपि कारक उच्यते।।३६।।
संस्करण की टीकापंचम भाव पुत्र का और सातवाँ स्त्री का कारक होता है। पाँचवें भाव में यदि कोई ग्रह हो तो वह भी उस भाव का कारक होता है।।३६।।
मेलापक सिद्धान्त
भावार्थगण (6 गुण) — हर नक्षत्र देव, मनुष्य या राक्षस गण (स्वभाव-वर्ग) का है। एक ही गण 6; देव–मनुष्य 5–6; देव–राक्षस 1; मनुष्य–राक्षस 0। यहाँ का बेमेल (गण दोष) मूल स्वभाव के टकराव का संकेत है, जो चन्द्र-राशि स्वामियों की मित्रता से कम होता है।
भावार्थयोनि (4 गुण) — हर नक्षत्र का एक पशु-स्वभाव है (अश्व, गज, मेष, सर्प, श्वान, मार्जार, मूषक, गो, महिष, व्याघ्र, मृग, वानर, नकुल, सिंह)। एक ही योनि 4; मित्र योनियाँ 3; सम 2; अमित्र 1; शत्रु-जोड़े (अश्व–महिष, गज–सिंह, मेष–वानर, सर्प–नकुल, श्वान–मृग, मार्जार–मूषक, गो–व्याघ्र) 0। यह सहज, शारीरिक अनुकूलता का माप है।
भावार्थनाड़ी (8 गुण) — सबसे भारी कूट। 27 नक्षत्र तीन नाड़ियों (आदि, मध्य, अन्त्य) में चक्र से बँटे हैं — शरीर-प्रकृति की धारा। भिन्न नाड़ी पूरे 8 देती है; एक ही नाड़ी 0 देती है और नाड़ी दोष है, मेलापक की सबसे गम्भीर आपत्ति (संतान और स्वास्थ्य से जोड़ी गई)। दोनों चन्द्र एक राशि में भिन्न नक्षत्रों में हों, या एक नक्षत्र में भिन्न चरणों में, तो दोष का शास्त्रीय परिहार है।
प्रश्न
हस्त नक्षत्र का स्वामी कौन है?
विंशोत्तरी में चन्द्र — हस्त में चन्द्र होने पर पहली महादशा चन्द्र की होती है, पूर्ण रूप में 10 वर्ष।
हस्त के गण, योनि और नाड़ी क्या हैं?
गण देव, योनि महिष (भैंसा), नाड़ी आदि — कुंडली मिलान के तीन नक्षत्र-आधारित कूट, 6, 4 और 8 गुण के।
हस्त किस राशि में है?
कन्या — इसके चार चरण नवांश राशियों मेष, वृषभ, मिथुन, कर्क में पड़ते हैं।
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