नक्षत्र 12/27 · Uttara Phalguni

उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र — Uttaraphalgunī

उत्तराफाल्गुनी सत्ताईस नक्षत्रों में 12वाँ है, निरयन राशिचक्र में 146°40′ से 160° तक का 13°20′ का खण्ड, सिंह और कन्या के भीतर। यहाँ जन्मा चन्द्र विंशोत्तरी चक्र सूर्य की दशा (6 वर्ष) से खोलता है, खण्ड का केवल शेष भाग बचा रहता है। कुंडली मिलान में इसका गण मनुष्य, योनि गो (गाय), नाड़ी आदि है।

एक दृष्टि में

क्रमांक
12 / 27गणित
विस्तार
146°40′ – 160° (13°20′)गणित
राशि
सिंह · कन्यागणित
चरण (नवांश राशि)
1: धनु · 2: मकर · 3: कुम्भ · 4: मीनBPHS shodashavarga.11
स्वामी (विंशोत्तरी)
सूर्यBPHS C29.80
विंशोत्तरी वर्ष
6BPHS C29.80
गण
मनुष्यMILAN.GANA
योनि
गो (गाय)MILAN.YONI
नाड़ी
आदिMILAN.NADI

ग्रंथों में इसका नाम

नीचे के श्लोक वे स्थान हैं जहाँ SIA का भण्डार इस नक्षत्र का नाम छापता है; ऊपर के दशा और मेलापक नियम वह सिद्धान्त हैं जिससे SIA गणना करता है।

BPHS C30.46बृहत् पराशर होरा शास्त्र · दशाध्यायः v75, folio 391

चान्द्ररौद्रभगार्यम्णमित्रेन्द्रवसुवारुणम् । एतत्ताराष्टकं चैव विज्ञेयं चान्द्रवत्क्रमात् ।।७५।।

संस्करण की टीकामृगशिरा, आर्द्रा, पूर्वाफाल्गुनी, उत्तराफाल्गुनी, अनुराधा, जेष्ठा, धनिष्ठा और शतभिषा— इन आठ नक्षत्रों के देह-जीवादि को मृगशिरा के समान समझना।।७५।।

PHAL C19.2फलदीपिका · Phaladīpikā 19.2

अग्न्यादितारपतयो रविचन्द्रभौम-सर्पामरेड्यशनिचन्द्रजकेतुशुक्राः । तेने नटः सनिजया चटुधान्यसौम्य-स्थाने नखा निगदिताः शरदस्तु तेषाम् ॥२॥

संस्करण की टीकाकृत्तिकादि नव नक्षत्रं में क्रमशः सूर्य, चन्द्रमा, मङ्गल, राहु, बृहस्पति, शनि, बुध, केतु और शुक्र दशापति होते हैं (उत्तराफाल्गुनी से पूर्वाषाढा पर्यन्त तथा उत्तराषाढा से भरणी पर्यन्त वे ही ग्रह क्रम से दशापति होते हैं) । सूर्यादि उपर्युक्त ग्रहों के क्रमशः ६,१०, ७, १८, १६, १९,१७,७ और २० वर्ष दशावर्ष होते हैं ॥२॥ … कृत्तिका, उत्तराफाल्गुनी और उत्तराषाढा नक्षत्रों में जन्म हो तो ६ वर्षीय सूर्य की दशा जन्म के समय होती है । रोहिणी, हस्त और श्रवण नक्षत्रों में यदि जन्म हो तो जन्म के समय १० वर्षीय दशा चन्द्रमा की होती है । इसी प्रकार अन्य नक्षत्रों में भी दशा समझनी चाहिए ।

मेलापक सिद्धान्त

MILAN.GANAमेलापक सिद्धान्त · मुहूर्त चिन्तामणि परम्परा · Melāpaka · Gaṇa kūṭa (Vivāha-prakaraṇa tradition)

भावार्थगण (6 गुण) — हर नक्षत्र देव, मनुष्य या राक्षस गण (स्वभाव-वर्ग) का है। एक ही गण 6; देव–मनुष्य 5–6; देव–राक्षस 1; मनुष्य–राक्षस 0। यहाँ का बेमेल (गण दोष) मूल स्वभाव के टकराव का संकेत है, जो चन्द्र-राशि स्वामियों की मित्रता से कम होता है।

MILAN.YONIमेलापक सिद्धान्त · मुहूर्त चिन्तामणि परम्परा · Melāpaka · Yoni kūṭa (Vivāha-prakaraṇa tradition)

भावार्थयोनि (4 गुण) — हर नक्षत्र का एक पशु-स्वभाव है (अश्व, गज, मेष, सर्प, श्वान, मार्जार, मूषक, गो, महिष, व्याघ्र, मृग, वानर, नकुल, सिंह)। एक ही योनि 4; मित्र योनियाँ 3; सम 2; अमित्र 1; शत्रु-जोड़े (अश्व–महिष, गज–सिंह, मेष–वानर, सर्प–नकुल, श्वान–मृग, मार्जार–मूषक, गो–व्याघ्र) 0। यह सहज, शारीरिक अनुकूलता का माप है।

MILAN.NADIमेलापक सिद्धान्त · मुहूर्त चिन्तामणि परम्परा · Melāpaka · Nāḍī kūṭa (Vivāha-prakaraṇa tradition)

भावार्थनाड़ी (8 गुण) — सबसे भारी कूट। 27 नक्षत्र तीन नाड़ियों (आदि, मध्य, अन्त्य) में चक्र से बँटे हैं — शरीर-प्रकृति की धारा। भिन्न नाड़ी पूरे 8 देती है; एक ही नाड़ी 0 देती है और नाड़ी दोष है, मेलापक की सबसे गम्भीर आपत्ति (संतान और स्वास्थ्य से जोड़ी गई)। दोनों चन्द्र एक राशि में भिन्न नक्षत्रों में हों, या एक नक्षत्र में भिन्न चरणों में, तो दोष का शास्त्रीय परिहार है।

प्रश्न

उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र का स्वामी कौन है?

विंशोत्तरी में सूर्य — उत्तराफाल्गुनी में चन्द्र होने पर पहली महादशा सूर्य की होती है, पूर्ण रूप में 6 वर्ष।

उत्तराफाल्गुनी के गण, योनि और नाड़ी क्या हैं?

गण मनुष्य, योनि गो (गाय), नाड़ी आदि — कुंडली मिलान के तीन नक्षत्र-आधारित कूट, 6, 4 और 8 गुण के।

उत्तराफाल्गुनी किस राशि में है?

सिंह और कन्या — इसके चार चरण नवांश राशियों धनु, मकर, कुम्भ, मीन में पड़ते हैं।

ये श्लोक अपनी कुंडली पर लागू होते देखिए।

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