नक्षत्र 4/27 · Rohini

रोहिणी नक्षत्र — Rohiṇī

रोहिणी सत्ताईस नक्षत्रों में 4वाँ है, निरयन राशिचक्र में 40° से 53°20′ तक का 13°20′ का खण्ड, वृषभ के भीतर। यहाँ जन्मा चन्द्र विंशोत्तरी चक्र चन्द्र की दशा (10 वर्ष) से खोलता है, खण्ड का केवल शेष भाग बचा रहता है। कुंडली मिलान में इसका गण मनुष्य, योनि सर्प, नाड़ी अन्त्य है।

एक दृष्टि में

क्रमांक
4 / 27गणित
विस्तार
40° – 53°20′ (13°20′)गणित
राशि
वृषभगणित
चरण (नवांश राशि)
1: मेष · 2: वृषभ · 3: मिथुन · 4: कर्कBPHS shodashavarga.11
स्वामी (विंशोत्तरी)
चन्द्रBPHS C29.80
विंशोत्तरी वर्ष
10BPHS C29.80
गण
मनुष्यMILAN.GANA
योनि
सर्पMILAN.YONI
नाड़ी
अन्त्यMILAN.NADI

ग्रंथों में इसका नाम

नीचे के श्लोक वे स्थान हैं जहाँ SIA का भण्डार इस नक्षत्र का नाम छापता है; ऊपर के दशा और मेलापक नियम वह सिद्धान्त हैं जिससे SIA गणना करता है।

BPHS C33.70बृहत् पराशर होरा शास्त्र · दशाफलाध्यायः v112, folio 443

रिक्तासानिष्टफलदा न्याध्यनर्थमृतिप्रदा । अत्युच्चेऽप्यतिनीचंगे मध्यगस्यावरोहिणी ।।११२।।

संस्करण की टीकारिक्ता कहते हैं इस दशा में अनिष्ट फल, व्याधि, अनेक अनर्थ होते हैं। अत्यंत उच्च और अत्यंत नीच के मध्य में गये हुये ग्रह की दशा को अवरोहिणी कहते हैं।।११२।।

BPHS C33.72बृहत् पराशर होरा शास्त्र · दशाफलाध्यायः v114, folio 443

दशाचारोहिणी नीचरिपुभांशगतस्य च । अधमाख्या भयक्लेश व्याधिदुःखविवर्धिनी ।।११४।।

संस्करण की टीकातया दशा आरोहिणी कहते हैं, नीच शत्रु की राशि या नवांशगत ग्रह ग्रह की दशा को अधम दशा कहते हैं यह दशा भय, कष्ट व्याधि दुःख को बढ़ाने वाली होती है।।११४।।

मेलापक सिद्धान्त

MILAN.GANAमेलापक सिद्धान्त · मुहूर्त चिन्तामणि परम्परा · Melāpaka · Gaṇa kūṭa (Vivāha-prakaraṇa tradition)

भावार्थगण (6 गुण) — हर नक्षत्र देव, मनुष्य या राक्षस गण (स्वभाव-वर्ग) का है। एक ही गण 6; देव–मनुष्य 5–6; देव–राक्षस 1; मनुष्य–राक्षस 0। यहाँ का बेमेल (गण दोष) मूल स्वभाव के टकराव का संकेत है, जो चन्द्र-राशि स्वामियों की मित्रता से कम होता है।

MILAN.YONIमेलापक सिद्धान्त · मुहूर्त चिन्तामणि परम्परा · Melāpaka · Yoni kūṭa (Vivāha-prakaraṇa tradition)

भावार्थयोनि (4 गुण) — हर नक्षत्र का एक पशु-स्वभाव है (अश्व, गज, मेष, सर्प, श्वान, मार्जार, मूषक, गो, महिष, व्याघ्र, मृग, वानर, नकुल, सिंह)। एक ही योनि 4; मित्र योनियाँ 3; सम 2; अमित्र 1; शत्रु-जोड़े (अश्व–महिष, गज–सिंह, मेष–वानर, सर्प–नकुल, श्वान–मृग, मार्जार–मूषक, गो–व्याघ्र) 0। यह सहज, शारीरिक अनुकूलता का माप है।

MILAN.NADIमेलापक सिद्धान्त · मुहूर्त चिन्तामणि परम्परा · Melāpaka · Nāḍī kūṭa (Vivāha-prakaraṇa tradition)

भावार्थनाड़ी (8 गुण) — सबसे भारी कूट। 27 नक्षत्र तीन नाड़ियों (आदि, मध्य, अन्त्य) में चक्र से बँटे हैं — शरीर-प्रकृति की धारा। भिन्न नाड़ी पूरे 8 देती है; एक ही नाड़ी 0 देती है और नाड़ी दोष है, मेलापक की सबसे गम्भीर आपत्ति (संतान और स्वास्थ्य से जोड़ी गई)। दोनों चन्द्र एक राशि में भिन्न नक्षत्रों में हों, या एक नक्षत्र में भिन्न चरणों में, तो दोष का शास्त्रीय परिहार है।

प्रश्न

रोहिणी नक्षत्र का स्वामी कौन है?

विंशोत्तरी में चन्द्र — रोहिणी में चन्द्र होने पर पहली महादशा चन्द्र की होती है, पूर्ण रूप में 10 वर्ष।

रोहिणी के गण, योनि और नाड़ी क्या हैं?

गण मनुष्य, योनि सर्प, नाड़ी अन्त्य — कुंडली मिलान के तीन नक्षत्र-आधारित कूट, 6, 4 और 8 गुण के।

रोहिणी किस राशि में है?

वृषभ — इसके चार चरण नवांश राशियों मेष, वृषभ, मिथुन, कर्क में पड़ते हैं।

ये श्लोक अपनी कुंडली पर लागू होते देखिए।

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